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Friday, June 22, 2007

अहमदाबाद के जातिवाद की हकीकत

रवीशजी का अहमदाबाद का जातिवाद पढा। पढते ही इच्‍छा हुई कि कुछ कहूं पर विचार बदल दिया। इसका कारण इस ब्‍लोग की दुनिया मे कभी जरुर बताउंगा।

आज मेरे जीरो कोलम की प्रतिक्रिया मे संजीत त्रिपाठीजी की टिप्‍प्णी पढी। उसने मुझे लिख्नने के लिये साक्षात उकसा दिया। इसलिये मेरे प्‍यारे ब्‍लोगियों यदि आपको मुझसे कोई शिकायत हो तो जरुर कहियेगा पर यह भी याद रखियेगा कि इसके मूल मे संजीत भैया हैं! मेरा आपसे एक ही आग्रह है कि जब आप इस पन्ने पर आ ही गये है, इसे पूरा पढें। पूरे दिल से कामेंट दे, हम कामेंट मोडरेट नही करते। हमारा ई मेल ID भी हमारे परिचय मे है ।

सबसे पहले तो मैं मेरा परिचय देता हूं जिससे कि आप मेरे इन विचारों को मेरीं दृष्‍टि से पढ खुद के नजरिये से देख सके । हम हिन्‍दुस्‍तानियों के आम नजरिये से मैं आगरा उत्तरप्रदेश से हूं क्‍योंकि मेरे पिता और दादा यहां जन्‍मे,पले और बडे हुए थे। बचपन ननिहाल गुडगांव में बीता। अ आ ई से A B C D वहीं सीखी। कोलेज और उसके बाद की जिन्‍दगी अर्थात लगभग ३५ साल अहमदाबाद में ही गुजारे हैं।

जिन्‍दगी में सिर्फ़ शुध्‍ध पत्रकारिता ही की है। इसकी शुरुआत इन्‍डियन एक्‍सप्रेस में ट्रेनी के रुप में की, कई वर्ष इन्‍डियन इक्‍सप्रेस का चीफ रिपोटर रहा और इस दौरान गुजरात का चप्‍पा चप्‍पा धूमा। आज कल भी पत्रकारिता कर रहा हू। प्रिन्ट में हिन्दी दैनिक चौपाल और नेट में अंग्रेजी में http://www.gujaratglobal.com/.

काका कालेलकर को सवाया गुजराती कहा जाता था। आप मुझे भी सवाया गुजराती कह सकते हैं। अपने इस परिचय के साथ मैं यह कहना चाहूंगा कि रवीशजी जिस किस्‍से की बात कर अपने टीवी का प्रचार कर रहे है वह एक अपवाद के रुप में लिया जाना चाहिए। इस एक किस्‍से को शहर या प्रदेश पर नहीं थोपना चाहिए।
अनामदासजी से मेरी यह गुजारिश है कि वे उनके सोसायटी के नाम के अनुभव को जातिवाद जैसे घिनौने शब्द से न जोड़े।

इस जातिवाद बवाल को समझने के लिये जरुरी है कि हम अहमदाबाद में मकान बनाने के फंडे को समझें। सबसे पहले तो यह कि यहां लोग प्लोट खुद डेवलप नहीं करते। अहमदाबाद में ७५ वर्ष ( या कुछ और अधिक वर्ष) पूर्व पहली हाउसिंग सोसायटी बनी। यह पालडी क्षेत्र में बनी। इसका आधार था कुछ समान विचार वाले, आपस में विश्‍वास करने वाले लोगों का इकठ्ठा हो अडौस पडौस में रहना।

अगर आप किसी भी मोहल्‍ले से ले राष्‍ट्र की रचना तक देखें तो उसका आधार भौगोलिक कम और भाषाई और जातीय अधिक रहा है। गुजरात में सोसायटी का विचार पनपा और अलग प्रकार के समुहों और समुदायों के लोगों ने इस प्रकार के मकान निजी क्षेत्र में बनाने शुरु किये। स्‍वाभाविक है कि संवैधानिक मूलभूत अधिकार के समांतर यह विचार पनपा।

बाद में व्‍यवसायिक बिल्‍डर इसमें आये। इससे दो स्‍थितियां बनी। एक तो यह कि लोग स्‍वयं इकठा हुए और दूसरा यह कि बिल्‍डर ने जमीन के लिये खुद लोगों को इकठा किया। साफ है कि सोसायटी न बनाने वाले लोगों के समूह बिल्‍डरों की स्‍कीमों में भी गये।

दो दशक पहले तक अहमदाबाद मुख्‍यतः व्‍यापारियों का शहर था। इसमें मुख्‍यतः गुजराती और राजस्‍थानी व्‍यापारी थे। पैसे वाले थे और वे ही सोसायटी में पैसा लगा खुद के लिये नये घर का विचार कर सकते थे। नतीजा यह हुआ कि ये सोसायटी इन प्रदेश, भाषा और जाति आधारित समूहों का दुकान के बाद का समूह स्‍थल बन गये। एक ही जाति या गांव के लोगों के कारण व्‍यापरियों को धंधे के काम से बाहर जाने पर यह विश्वास रहता था कि उसके परिवार की सुरक्षा की कोइ चिन्ता नहीं है। साथ ही यह भी सुनिश्चित हो जाता था कि उसका परिवार उनकी जाति और प्रदेश के माहौल में ही पलेगा। क्या ये सब विचार अहमदाबाद में ही है। क्या दुनिया के अन्य प्रदेशों मे यह नही है?

रविशजी महानगरों में भी मोहल्ले हैं। अमरिका में चाईना टाऊन है। न्यूजर्सी में तो गुजराती ही भरे हुए हैं । लंडन में भारतीयों की बस्ती का प्रतीक है वै्म्बली क्षेत्र। हमारी सहसम्पादक नेहाजी पिछ्ले साल ही ब्रिट्न गई थी। बडी खुश हुई वै्म्बली में गुजरात देखकर। आई तो बोली वै्म्बली यानि कि अहमदाबाद का माणेक चौक। अहमदाबाद आए होंगे तो रवीशजी ने शायद माणेक चौक देखा हो। यह अहमदाबाद का चांदनी चौक है।

य़ह मूल मानवीय सुरक्षा का भाव इसलिये भी पनपा क्योकिं लोग मकान खुद बनाते थे। पर अब गुजरात हाउसिंग बोर्ड (डी डी ए, हुडा वगैरह का छोटा भाई) बना तब हर आदमी के लिये हर जगह (जेब में पैसा हो तो) वाले मकान बनने शुरु हुए।
रवीशजी जब आपनें अहमदाबाद में जातिवाद पर फ़ोकस किया तो कितने बिल्डरों से पूछा? तथाकथित नेताओं से इसका कारण पूछा? अरे भैये अपने कर्णधार संजय जी से ही पूछ लेते कि शाहीबाग मे राजस्थानी लोग ज्यादा क्यों रहते हैं ? राजस्थानियो की सोसायटी, उनके स्कूल और अस्पताल भी ।

आपने तो लोगों के विचारों पर यह सब लिखा। में खुद के अनुभव की बात करूंगा । मेरे पास अखबारनगर में मकान था। जब यह नगर बना तब केवल पत्रकारों के लिये ही यह था (सरकार की कोई रियायत नहीं थी) यह कौनसा जातिवाद है? आज वहां चंद पत्रकार हैं। बाकी हर जाति, प्रदेश के लोग हैं। अहमदाबाद मे विद्यानगर मे सभी पढने लिखने वाले ही क्यो रहते हैं ? दिल्ली का मयूर विहार, विवेक विहार, ऐसा क्यूं है ?

मैं साबरमती में रहता हूं जिसका उपनगर चांदखेडा है। मेरे फ़्लैट में सभी जैन रहते थे। जब मैने मकान लिया तब बिल्डर ने पूछा कि क्या मैं मांसाहारी हूं? कारण? बाकी सब जैन हैं। अब यदि कुछ लोग अपने खान पान और विचार व्यवहार के आधार पर एक साथ रहना चाहें तो आप इसे जातिवाद के चश्में से क्यों देखना चाह्ते हो? वैसे भैये हम शुद्ध शाकाहारी हैं ।

खैर कुछ वर्ष पूर्व हमारे फ़्लैट के एक मित्र ने उनका मकान एक बडे सिंधी व्यापारी को बेच दिया। बाकी जैन धुआं पूआं हो गये। उसने उन सभी को कहा कि मैं मकान बेचना चाहता हूं। वह व्यक्ति अच्छा पैसा दे रहा है। तुम अगर थोडा कम भी दे दो तो तुम्हे बेच दूं । कोई तैयार नहीं हुआ। हमारे फ़्लैट में अब जैन के अलावा यह ब्राह्मण पत्रकार और सिंधी व्यापारी भी है। वैसे फ़्लैट का नाम देवदर्शन है, जैनदर्शन नहीं।

मैं केवल यह कहना चाहता हूं कि हाउसिंग सोसायटी का विचार एक विशेष समूह के लोगों के एक साथ रहने के कारण पनपा । आज अन्य प्रदेश जहां अभी भी जमीन का प्‍लोट ले मकान बनवाते हैं यह समूह भावना एक अकल्‍पनीय विचार हैं। अगर वहां भी यह व्यवस्था शुरु हो तो आपको ऎसी ही सोसायटी मिलेंगी ।

इन्‍टरनेट पर विभिन्‍न ग्रुप क्‍या इसी समूह भावना का प्रतिबिम्‍ब नहीं हैं। मेरा सभी ब्‍लोगिया मित्रों से आग्रह है कि हम इन चीजों को उनके संपूर्ण स्‍वरुप में देखें। जाति आधारित समूह खराब और बाकी सब अच्छे । यह कैसी उल्टी पुल्टी सोच है?

रवीशजी स्‍टोरी फिर भी बनेगी। अहमदाबाद की सोसायटियों के रसप्रद नाम और उनमें रहने वाली मजेदार भारत की बस्‍तियां। पर इसके लिये थोडा टाईम निकालना पडता है और अपने सीमित परिचितों के घेरे से निकल तरह तरह के लोगों से मिलना पडता हैं।

आप ओ हेनरी की कोस्‍मोपोलिटन पढे। एक व्‍यक्‍ति जो खुद को कोस्‍मोपोलिटन बता रहा था वह उसके गांव के बारे में एक व्‍यक्‍ति से एक होटल में लड मरा। व्‍यक्‍ति की किसी न किसी प्रकार के समूह में रहने की वृति उसकी वास्‍तविक असुरक्षा की भावना से इतनी गहरी जुडी है कि हर समाज, देश और समूह में हर समय रहती हैं। और ऎसे में अहमदाबाद को जातिवाद की गाली दे क्यो बदनाम करते हैं।

जे क्रृष्णमूर्ति ने कहा है कि मूलभूत असुरक्षा से भागने के लिये मनुष्य गुट बनाता है और इसकी शुरूआत परिवार नाम की संस्था से होती है और इसकी पराकाष्ठा राष्ट्रवाद है ।

10 comments:

अतुल शर्मा said...

बहुत सुंदर, यही बात मैं लोगों को बताना चाहता था कि गुजरात की तस्वीर हमेशा वह नहीं होती जो दिखाई जा रही है। आजकल लोग बस गुजरात को गालियाँ दिए जा रहे हैं।
अहमदाबाद की यह तस्वीर पेश करने के लिए धन्यवाद।

अरुण said...

भाइ जी "जाकी रही भावना जैसी "कोई गलत नही कहा गया,इनको एक बार गलत राह दिखनी चाहिये बस, सही बात की तलाश इनकी मंजिल कहा है,मै इनको लमबे अरसे से देख रहा हू सच न इनको दिखता है न ये देखना चाहते है,क्भी कभी तो लगता है शायद इन्ही लोगो के लिये आख के "अंधे नाम नैन सुख"कहा गया है आप इनको लाख सम्झाये इनकी समझ मे आने वाला नही.गुजरात नाम से वैसे ही इनकी धम्नियो मे रक्त प्रवाह तेज हो जाता है,ऐसे मे सच न दिखाई देगा न सुनाई

अनूप शुक्ला said...

लेख और लिखने का अन्दाज बहुत भाया।

Shrish said...

अपनी बात बहुत अच्छे से रखी आपने। आपसे सहमत हूँ कि यदि लोग अपने आचार-व्यवहार के आधार पर इकट्ठा रहना चाहें तो इसमें क्या बुराई है।

Sanjeet Tripathi said...

शानदार!!
शुक्रिया कि इस मुद्दे पर आपने लिखा!!
मुझे इस मामले में अमदावादियों की ही प्रतिक्रिया जाननी थी और करीब करीब आप जैसी ही प्रतिक्रिया हमारे अमदावादी सॉफ़्टवेयर इंजीनियर मित्र ने आज ऑनलाईन चैट के दौरान दी !!
हमारे मित्र ने हमसे कुछ सवाल भी पूछे हमसे-
1---मीडिया को मोदी में हिंदुत्व ही क्यों नज़र आता है?
2--क्या गुजरात में हिंदु-मुस्लिम के अलावा मीडिया के पास और कोई मुद्दा नहीं?
3-- क्या पिछले पांच सालों के दौरान मीडिया को यह नही दिखा कि गुजरात में भ्रष्टाचार कितना घटा या बढ़ा?
उन्होनें ऐसे ही कई सवाल दागे!!
अब इनके जवाब तो मीडिया से जुड़े लोग ही बेहतर दे पाएंगे!!

आभार!!

अभिनव said...

आपने अपनी बात बहुत अच्छे तरीके से रखी है। यह ज़रूरी होता है कि निष्कर्ष निकालने से पूर्व, तथ्यों का पूरा आंकलन किया जाए।

masijeevi said...

योगेश, रवीश के यहॉं हमने टिप्‍पणी की थी –

सुना था पर लगा कि बढ़ा-चढ़ा कर बता रहे होंगे, कोई छुटपुट मामला होगा पर जब आप स्‍पेशल रिपोर्ट करके आए हैं तब तो मामला गंभीर है...

अब आप उसी तथ्‍य का एक भिन्‍न पाठ दे रहे हैं। जब कंटेंट एनालिसिस के प्रचलित तरीके से आपके वर्णन का सूक्ष्‍म पाठ करता हूँ तो एक तो यह पता चलता है कि आप रवीश के ‘तथ्‍य’ से कम असहमत हैं उसके परिमाण से आपकी अधिक असहमति है। आपके उदाहरण पेशेगत बसावट की बात करते हैं जबकि रवीश का बलाघात धर्म व जाति पर था। मैं अमदाबाद नहीं गया- कभी नहीं, इसलिए आप पत्रकारों के सच में ही से ‘सच’ पढ़ने की कोशिश कर सकता हूँ।
इतना फिर भी तय है कि यदि किसी महानगर में जाति बसावट का मुख्‍य आधार है तो (गांव में तो होता ही है) तो इसे स्‍वाभाविक कहना ठीक नहीं। क्‍योंकि इससे आपसी अविश्‍वास (व घृणा) बढ़ेगी ही और परिणाम ‘गुजरात’ भी हो सकता है। हॉंलांकि एक ‘यदि’ अभी बरकरार है।

अनामदास said...

प्रिय योगेश जी
मेरा इरादा सिर्फ़ जातिवादी संकीर्णता पर चोट करने का है, गुजरात के मेरे अनुभव मुझे जो बताते हैं वही मैंने कहा. जातिवाद की समस्या पूरे देश में है लेकिन गुजरात में इसका रूप थोड़ा अधिक भयावह दिखता है.
समस्या को स्वीकार न करने की सबसे बड़ी समस्या ये है कि वह कभी हल नही हो सकती.
हाँ, आपने जातिवाद के कारणों पर अच्छी रोशनी डाली है.

Pankaj Bengani said...

मुझे उम्मीद थी कि आप रविशजी की शंकाओं का जरूर समाधान करेंगे.

आप ने उम्मीद पुरी की. बहुत धन्यवाद.

Maulik's Blog said...

Bahot Achha Jawab Diya hai aapne, kal sanjeet ji muje bol rahe the aur unke saath bhi yahin charcha hui ki isko jatiwad se nahin jod sakte aap. economic ke hisab se hi ghar lete hai log aur locality bhi dhyan mein toh lena hi padta hai.

Bahot Bahot Dhanyawad..Hamare vicharon ko duniya ke samne rakhane ke liye..


-Ek Indian jo ek Gujarati bhi hai aur Ahmedabadi bhi hai

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