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Tuesday, December 4, 2007

गुजरात भवन में रहने के टिप्स

दिल्ली में चाणक्यपुरी मे जहां एक और सभी देशों के दूतावास हैं वहीं सभी राज्यों के भवन भी हैं । उसमे अपने गुजरात का भवन भी है। चुनाव टिकट रिपोर्टिंग के चक्कर मे एक पखवाडे मे तीन बार वहां रुकना हुआ। हम यहां अपने अनुभव के निचोड को पाठको की सुविधा के लिये पेश कर रहे हैं।

सर्वप्रथम तो जहां तक संम्भव हो यहां रुकना टाले, सिवाय की आप गुजरात सरकार के आला अफ़सर है या फ़िर राजनीतिक तोप हैं। या फ़िर हमारी तरह मजबूरी मे रुक रहे हैं।

यह समझने के लिये यह बता दें कि विपक्ष के नेता अर्जुन मोढवाडिया को भी कमरा मिलने में दिक्कत होती है। दूसरा तरीका यह है कि काउंटर पर अगर आप मा-बहन कर सकते हैं तो आपके कमरा पाने के अवसर बढ जाते हैं। एक दिन सुबह सुबह लीम्बडी के विधायक भवान भरवाड के बुकिंग कराने के बावजूद उन्हे कमरा नही मिला तो उन्होने मोदी सरकार का मां बहन चालीसा गाना शुरू किया । और स्टाफ़ को तुरन्त ही उनके लिये कमरा दिखलाई दे गया। उसके बाद हमने यह नुस्खा सफ़लतापूर्वक कईयों को अपनाते हुए देखा।

यदि आप तोप नही हैं तो मेहरबानी कर आप अपना तौलिया और साबुन जरूर ले जायें । यहा यह आसानी से नही मिलता। ऎसा भी हो सकता है कि आपके काफ़ी रिकझिक करने पर आपको फ़टा हुआ तौलिया मिले। वैसे तो चद्दर वगैरह भी कब बदली जाती है, इसके नियम हम अभी तक नही समझ पाये हैं। यह अनुभव आधारित सलाह है।



भले ही आप को गुजराती संस्कृति और गुजरात से कितना भी लगाव हो, यहां गुजरात ढूंढने की कोई कोशिश न करें। अन्यथा यह खुद को दुखी करने का एक प्रयास ही होगा।यहां सुबह नाश्ते मे गुजराती फ़ाफ़डा, खमण मिलना बंद हो गया है। भोजन मे जरूर गुजराती छटा है, पर इसमे भी छाश, कचुमर जैसी वस्तुएं लुप्‍त हो गई है। सारा स्टाफ़ बाहर का है और वह दो तीन गुजराती शब्द ही जानता है। केम छो, आवजो और रूम नथी!!!



हमने देखा कि अधिकतर लोग बाहर खाना पसंद करते हैं। ये वो लोग हैं जिन्हे गुजरात भवन मे रहने का पाला बार बार पडता है। मांसाहारी खाने के शौकीन बगल के जम्मू कश्मीर भवन मे जाते है और शाकाहारी लोगों के लिये निकट का मध्यप्रदेश भवन प्रिय स्थल है। आप कोई और स्थल भी चुन सकते हैं।

पिछले काफ़ी समय से यहां रिक्त स्थानो की भरती ना होने के कारण यहां का स्टाफ़ हमेशा काम के बोझ के तले ही दबा रहता है। हालांकि यह आथित्य सत्कार क्षेत्र का अंग है, यहां के स्टाफ़ को कोई भी नया अतिथी एक बोझ लगता है। अपनी समस्याऒं का अधिकारियों द्वारा हल ना पा सकने के कारण स्टाफ़ का शिकार आने वाले मेहमान होते हैं । क्योकि तोप लोगो के सामने कुछ नही चलती इसलिये स्टाफ़ की भडा़स एक या दूसरे तरीके से आम अतिथी पर ही निकलती है। आप इस भडा़स को अपने तरीके से हेंडल कर सकते हैं! आप या तो खुद का भेजा गरम कर सकते हैं या फ़िर सामने वाले की जेब!!!

अगर आप रूम मे टिक ही गयें हैं तो आप पंखों पर जमी गंद की काली पर्त से ना घबरायें। यह गंद इतनी जोरदार चिपक गई है कि आप पर इसका एक कण भी नही गिरेगा। हमने इस गर्द का वजन ढूंढ्ने का कोई सार्थक प्रयास नही किया है इसलिये हम यह बताने की स्थिति मे नही हैं कि ये पंखे कब तक इस गर्द का बोझ सहन कर पायेंगे।

नहाते समय इस बात का ध्यान रखे कि पानी जा सकता है, या फ़िर गीजर काम न करता हो। पर अभी ये घटनायें जल्दी जल्दी नही होती हैं । चाय कॉफ़ी आने पर यदि केतली का ढ्क्कन नदारद हो तो वेटर को कोसने की जगह चाय कॉफ़ी जल्दी से गुटकने पर शक्ति केंद्रित करें । आपके स्वास्थय और जेब के लिये यही हितकर होगा। रूम मे टोस्ट खाने के लिये सामान्य ओर्डर देने से थोडे ज्यादह प्रयत्न करने के लिये तैय्यार रहें। आपको तैय्यार जवाब मिलेगा, कि टोस्टर बिगडा हुआ है। ब्रेड बटर से काम चला लो।

यदि आप यह मानते हैं कि काउंटर पर चाबी छोडने से आपका कमरा साफ़ मिलेगा, तो आप अपनी धारणाऒ के टूटने के दुख को सहन करने के लिये तैय्यार रहें। मित्रो ये टिप्स पीछे वाली विंग मे अधिक लागू होते है।

यह हाल पिछले कुछ वर्षो मे ही हुआ है। एक जमाना था कि गुजरात भवन नम्बर वन था। यहां बाहर के लोग भी आ कर उनके कार्यक्रम किया करते थे।

मजेदार बात तो यह है कि अपने मुख्यमंत्री नरेन्द्रभाई भी जब दिल्ली आते हैं तो यही रुकते है। पर वो तो CEO ठहरे गुजरात के। दिल्ली मे विभिन्न राज्यों के भवन उन राज्यो के परिचायक हैं । और यह है परिचय हमारे नरेन्द्र्भाई के नम्बर वन गुजरात के गुजरातभवन का!!!

1 comment:

संजय बेंगाणी said...

ऐसी दूर्दशा?!!!

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