पुलित्जर पुरुस्कार
इस सप्ताह पत्रकारिता में प्रतिष्ठित पुलित्जर पुरुस्कार की धोषणा हुई। १४ में से छह पुरुस्कार प्राप्त कर वाशिंगटन पोस्ट छाया रहा। १९१७ में शुरु हुए इस पुरुस्कार ने विश्व स्तर पर अपना स्थान बना लिया है।
इस पुरुस्कार की शुरुआत इसके प्रणेता जोसेफ पुलित्जर के निधन के बाद हुई। पुलित्जर ने उनकी वसियत में इस पुरस्कार के लिये राशि निश्चित की थी। साथ कोलम्बिया युनिवर्सिटी में स्कूल ऑफ जर्नलिज्म का प्रावधान किया था।
पुलित्जर की कहानी एक संधर्षशील पत्रकार प्रकाशक की कहानी है। उसने उसके जीवन काल में भ्रष्टाचार के विरुध अभियान चलाया । पुलित्जर प्राईज के द्वारा उन्होने उनके अभियान को एक सतत अभियान बना दिया। इस प्राईज की विशेषता यह है कि इसकी जूरी को नियमो में परिवर्तन की छुट दी गई है। इससे इसमे नई श्रेणियों का समावेश भी हुआ है। हंगरी के सम्पन्न परिवार में जन्में जोसेफ पुलित्जर का जन्म १० अप्रैल १८४७ में हुआ। प्रतिवर्ष अप्रैल में ही पुलित्जर प्राईज दिये जाते हैं। उनकी इच्छा फौज में जाने की थी। पर कमजोर स्वास्थ्य और दृष्टि के कारण वे इसमे सफल नहीं हुए। कलम के सिपाही के रुप में वे एक अन्तराष्ट्रीय व्यक्तित्व बन गये।
सामान उठा और होटल में वेटरगिरी करने वाले पुलित्जर का भाग्य भी एक आकस्मिक घटना से खुल गया। एक दिन एक लाईब्रेरी में उन्होने दो शतरंज के खिलाडियों को कुछ चाले समझाई। ये खिलाडी काफी प्रभावित हुए। उन्होने पुलित्जर से काफी चर्चा की। ये दोनों जर्मनी के मशहूर अखबार के सम्पादक थे। उन्होने पुलित्जर को नौकरी दी। और वह पत्रकार बन गया।
२५ वर्ष की उम्र में वह प्रकाशक बन गया। सुबह से रात तक काम करने वाले पुलित्जर ने खोजी पत्रकारिता पर जोर दिया। जल्द ही वह और उसका अखबार मशहूर हो गये। उन्होने आर्थिक संकट में फंसे न्यूयोर्क वर्ल्ड को खरीद उसकी भी कायापलट दी।
पर खराब स्वास्थ्य के कारण ४३ वर्ष की उम्र के बाद वे कभी अखबार के कार्यालय में नहीं गये। इसी दौरान उन्हे आवाज से एलर्जी हो गई और दो दशक तक अपनी नौका में एक साउन्ड प्रूफ़ कमरे में ही रहे। इसे लोग टावर ऑफ साइलेन्स के नाम से पुकारते थे।
इसी समय के दौरान व्यवसायिक स्पर्धा में उन्हें कई अखबारों का सामना भी करना पडा़। १९११ में उनका निधन हो गया। १९१२ में कोलम्बिया स्कूल ऑफ जर्नलिज्म की शुरुआत हुई और १९१७ में पुलित्जर पुरुस्कार की।


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