Followers

Thursday, April 10, 2008

पुलित्जर पुरुस्कार

इस सप्ताह पत्रकारिता में प्रतिष्ठित पुलित्जर पुरुस्कार की धोषणा हुई। १४ में से छह पुरुस्कार प्राप्त कर वाशिंगटन पोस्ट छाया रहा। १९१७ में शुरु हुए इस पुरुस्कार ने विश्‍व स्तर पर अपना स्थान बना लिया है।
इस पुरुस्कार की शुरुआत इसके प्रणेता जोसेफ पुलित्जर के निधन के बाद हुई। पुलित्जर ने उनकी वसियत में इस पुरस्कार के लिये राशि निश्चित की थी। साथ कोलम्बिया युनिवर्सिटी में स्कूल ऑफ जर्नलिज्म का प्रावधान किया था।
पुलित्जर की कहानी एक संधर्षशील पत्रकार प्रकाशक की कहानी है। उसने उसके जीवन काल में भ्रष्टाचार के विरुध अभियान चलाया । पुलित्जर प्राईज के द्वारा उन्होने उनके अभियान को एक सतत अभियान बना दिया। इस प्राईज की विशेषता यह है कि इसकी जूरी को नियमो में परिवर्तन की छुट दी गई है। इससे इसमे नई श्रेणियों का समावेश भी हुआ है। हंगरी के सम्पन्न परिवार में जन्में जोसेफ पुलित्जर का जन्म १० अप्रैल १८४७ में हुआ। प्रतिवर्ष अप्रैल में ही पुलित्जर प्राईज दिये जाते हैं। उनकी इच्छा फौज में जाने की थी। पर कमजोर स्वास्थ्य और दृष्टि के कारण वे इसमे सफल नहीं हुए। कलम के सिपाही के रुप में वे एक अन्तराष्ट्रीय व्यक्तित्व बन गये।
सामान उठा और होटल में वेटरगिरी करने वाले पुलित्जर का भाग्य भी एक आकस्मिक घटना से खुल गया। एक दिन एक लाईब्रेरी में उन्होने दो शतरंज के खिलाडियों को कुछ चाले समझाई। ये खिलाडी काफी प्रभावित हुए। उन्होने पुलित्जर से काफी चर्चा की। ये दोनों जर्मनी के मशहूर अखबार के सम्पादक थे। उन्होने पुलित्जर को नौकरी दी। और वह पत्रकार बन गया।
२५ वर्ष की उम्र में वह प्रकाशक बन गया। सुबह से रात तक काम करने वाले पुलित्जर ने खोजी पत्रकारिता पर जोर दिया। जल्द ही वह और उसका अखबार मशहूर हो गये। उन्होने आर्थिक संकट में फंसे न्यूयोर्क वर्ल्ड को खरीद उसकी भी कायापलट दी।
पर खराब स्वास्थ्य के कारण ४३ वर्ष की उम्र के बाद वे कभी अखबार के कार्यालय में नहीं गये। इसी दौरान उन्हे आवाज से एलर्जी हो गई और दो दशक तक अपनी नौका में एक साउन्ड प्रूफ़ कमरे में ही रहे। इसे लोग टावर ऑफ साइलेन्स के नाम से पुकारते थे।
इसी समय के दौरान व्यवसायिक स्पर्धा में उन्हें कई अखबारों का सामना भी करना पडा़। १९११ में उनका निधन हो गया। १९१२ में कोलम्बिया स्कूल ऑफ जर्नलिज्म की शुरुआत हुई और १९१७ में पुलित्जर पुरुस्कार की।

Wednesday, April 2, 2008

गुजरात पर रिसर्च के लिये विधानसभा लाइब्रेरी!

अपने गुजरात विधान सभा के नये अध्य्क्ष आजकल विधान सभा के पुस्तकालय का उपयोग बढाने मे लगे हुए है । ७७००० से अधिक पुस्तकों वाले इस पुस्तकालय की विडम्बना यह है कि किताबे पढने वाला कोई नही है। इसके सदस्य केवल १८२ विधायक और विधानसभा के सदस्य ही है। मुश्किल से एक दर्जन विधायक इसका उपयोग करते हैं।
जनवरी मे विधानसभा अध्यक्ष बनने के बाद अपने भट्ट्जी ने लाइब्रेरी का जब दौरा किया तब यह बात बाहर आई। उन्होने सभी विधायकों को इस पुस्तकालय का उपयोग करने को कहा। विधान सभा के बजट सत्र के बाद पत्रकारों के साथ बातचीत मे उन्होने कहा कि यदि कोई व्यक्ति गुजरात पर रिसर्च करना चाहता है तो वे उसे लाइब्रेरी की पूरी सुविधा देंगे। विधानसभा की कार्ववाही का रिकार्ड राज्य के ईतिहास का एक अनोखा रूप है।
अपने भट्ट्जी ठहरे मीडिया गुरू। उनका कहना है कि नर्मदा पर हुई बहस नर्मदा के कार्य का एक अधिकारिक दस्तावेज है। इसी प्रकार राज्यपाल का विधानसभा को सम्बोधन राज्य की प्राथमिकताऒ के बदलते स्वरूप को प्रतिबिम्बित करता है। किसी भी पी एच डी छात्र के एक अच्छे गाईड बन सकते हैं अपने भट्टजी! अखबारवालो को अच्छी कापी देने मे तो माहिर हैं ही अपने भट्टजी । यह समाचार इसका एक अच्छा उदाहरण है।
आज भट्ट्जी से मिलना हुआ। उन्होने एक डिजाईनर को बुलाया हुआ था। एक अच्छे रिसर्च हाल की रूपरेखा दे रहे थे। बोले ब्रिटिश लाइब्रेरी के मैनेजर सतीश देशपांडे जैसे एक्सपर्ट की सलाह ले इसे एक ऎसी लाइब्रेरी बनाना है जिसमे लोग शांति से पढ सके और चाहे तो उन मुद्दों पर चर्चा कर सकें !! भट्ट्जी का आफ़र सभी के लिये है, कोई भी उनका सम्पर्क कर सकता है.

फ़र्जी मुठभेड हीरो वणजारा को मानवाधिकार याद आया

गुजरात के बाहोश अफ़सर डी जी वणजारा और उनके साथी आला अफ़सर आजकल काफ़ी परेशान है। उनके वकील का कहना है कि पुलिस उनकी तौहीन कर रही है। पुलिस उन्हे हथकडी पहनाने की बात कर रही है। वणजारा और उनके साथी सोहराबुद्दिन की फ़र्जी मुठ्भेड के लिये आजकल साबरमती जेल मे हैं ।
कुछ समय पहले वणजारा ने अस्वस्थता की शिकायत की थी। जेल के डाक्टर का कहना था कि सिविल अस्पताल ले जाओ इन्हे। उन्हे ले जाने के लिये पुलिस बुलाई गई। इन्सपेक्टर ने हथकडी लगाने की बात की। वणजारा आग बबुला हो गये। बोले कि यह सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ़ है।
कुछ दिन बाद यही घटना एक अन्य अफ़सर के साथ हुई। उन्होने भी आग बबुला हो पुलिस के साथ जाने से इंकार कर दिया। सोहराबुद्दिन की फ़र्जी मुठ्भेड और उसकी बीबी को जिंदा जलाने के किस्से मे गुजरात और राजस्थान पुलिस के एक दर्जन पुलिसवाले जेल मे हैं । इनमे तीन आइ पी एस अधिकारी है।
इनके वकील ने अहमदाबाद के एक अदालत मे शिकायत की है और कहा है कि वणजारा और उनके साथी आला अफ़सरो के साथ पुलिस का व्यवहार मानवाधिकार भंग का मामला है। देखा फ़र्जी मुठभेड वालो को भी मानवाधिकार याद आता है, जब खुद का किस्सा होता है।खैर जिस अदालत पर लोग मानवाधिकार का गलत पक्ष लेने की बात करते है, उसने इस किस्से मे पुलिस के आला अफ़सरो को १४ अप्रैल को हाजिर होने को कहा है जहा उनसे पूछा जायेगा कि वो वणजारा और उनके साथी आला अफ़सर को हथकडी लगाने की बात क्यों करते हैं ?

Tuesday, April 1, 2008

अब शेर हाथी दत्तक लो !

अहमदाबाद नगर निगम एक अनोखी योजना लाया है। आप इसके प्राणी संग्राहलय के किसी भी प्राणी या पक्षी को दत्तक ले सकते है। हम यह स्पष्ट कर दे कि आप इन्हें घर नहीं ले जा सकते हैं । पर इनके घर के बाहर आप्के नाम की तख्ती लगी होगि जो आपको और अन्य को यह बतायेगी कि इसके पालक पिता या माता आप हैं।
आप इनसे मिलने जा सकते हैं। आप इनकी खाने पीने और रहने की व्यवस्था के बारे मे संग्राहलय के अधिकारी की कान खिचाई कर सकते हैं। संग्राहलय के अधीक्षक डा आर के साहू का कहना है कि काफ़ी लोग इसमे रस ले रहे हैं। ऎक व्यक्ति अपने पुत्र की सालगिरह पर एक चिडिया दत्तक लेने का विचार कर रहा है। उसका कहना है कि जन्मदिन का खर्चा चिडिया के नाम !
साहू के अनुसार यह प्राणी संग्राहलय को फ़ंड तो दिलवायेगा ही, साथ ही यह अहमदाबाद के लोगो मे प्राणी प्रेम भी बढायेगा।
आप दत्तक लेना चाहते है किसी को । चिडिया का एक साल का रू ३६००, हाथी का रू २.५८ लाख, हिप्पोपोटोमस का १.५१ लाख और चीते का १.२६ लाख

Monday, March 31, 2008

नोट को सम्मान दो

नोट को सम्मान कौन नही देता है ? नोट के लिये तो लोग क्या नही करते? लक्ष्मी की पूजा करते है। भगवान से सौदा करते हैं। कहते हैं कि हे भगवान हमें इतने पैसे दे दो, हम तुम्हे ये दे देंगे। कटकी बोलो या फ़िर कहो कमीशन।
पर नोट यानी कि कागज़ के नोट की तो हालत खस्ता है। लोग इस पर ना जाने क्या क्या लिखते हैं ? जरा सोचो कितना महंगा राईटिंग पैड होता है यह लिखा हुआ नोट। लोग फ़ूलों की माला पहराते हैं। पर कितने महंगे फ़ूल खरीदे जा सकते हैं। और फ़िर गले से फ़ूल उतरे नहीं कि गये कचरे की टोकरी में।
नोटों की माला पहनाओ और अगले को उसकी कीमत बताओ। और उसके दरबार मे अपना रुतबा बढाओ!
कितना जोरदार ख्याल है? लोग करते ही हैं यह सब। पर अपने रिजर्व बैंक का मानना है कि यह सब तो बेचारे नोट का अपमान है। नोट भगवान है, रिजर्व बैंक का कहना है। वो इंसान के गले का हार कैसे बन सकता है। रिजर्व बैंक ने हाल ही मे सभी से अपील की है कि नोट भगवान है उसे सम्मान दो। मान गये अपने रिजर्व बैंक के इस अध्यात्म दर्शन को।
बोलो जै नोट भगवान की!!!!

अहमदाबाद में सस्ती शराब

आहमदाबाद और शराब । पूरे गुजरात मे जब शराबबंदी है, तब अहमदाबाद मे शराब कैसे मिल सकती है? वो भी सस्ती शराब ! आज अहमदाबाद के एक अखबार ने पहले पन्ने पर सस्ती शराब के समाचार छापे। अखबार का कहना है कि यह पुलिस द्वारा पकडी गई शराब है। यह ४० से अधिक उम्र वालों को ही मिलेगी। पहले आओ, माल पाओ।
रिपोर्टर ने अपनी तरफ़ से काफ़ी मेहनत भी की लगती है। उसने यह भी बताया है कि सरकारी दुकान पर क्या भाव है और सस्ती शराब का क्या दाम है। महिलाओं और बालकों को दारू नही बेची जायेगी । उम्र का सबूत लाना जरूरी है।
भैये यह है अंदाज अपने अहमदाबाद के एक अखबार के अप्रैल फ़ूल मनाने का। यह अखबार है संदेश । गुजरात समाचार का अंदाज ही अलग है। अखबार मे सूचना है कि यदि अखबार के गिफ़्ट कूपन मे सूर्य का निशान पाओ तो हमसे रु१,००० ले जाओ!!
यह तो आप को गुजरात मे अप्रैल फ़ूल की एक झलक बतलाने के लिये है, आपका अप्रैल फ़ूल बनाने के लिये नही।

Wednesday, February 27, 2008

मीडिया मास्टर भट्टजी

सुर्खियों में कैसे छा जाना यह तो सीखे कोई वरिष्ट भाजपा नेता अशोक भट्ट से। विषय कोई भी हो , हमारे भट्टजी उसे मीडिया में इस तरह से उछाल सकते हैं जैसे अपने धोनी भाई किसी भी खिलाडी की बॉल को बाउन्ड्री तक पंहुचाते है।

सबसे अधिक बार निर्वाचित विधायक का भट्टजी का रिकार्ड खुद ही एक बडी उपलब्धी है। इसे कोई संयोग कह सकता है। पर कानून मंत्री के रुप में जिस तरह से उन्होने सुर्खिया बटोरी इसने एक बात तो सिद्ध कर दी कि कानून मंत्रालय तर्क आधारित बोरिंग विषय का मन्त्रालय नहीं है।

अब विधानसभा के अध्यक्ष के नाते, विधानसभा की कार्रवाई में उनकी भूमिका उन्हे हर रोज अखबारों में जगह दिलवाती है। यह तो उनके पद से जुडी कार्रवाई है। पर हमारे भट्टजी तो भट्टजी हैं। विधानसभा के अंदर ही नही, वे तो बाहर भी काफ़ी सक्रिय है।

पिछले हफ़्ते कुछ पत्रकार उनसे मिलने पहुंचे। मुद्दा था विधानसभा का प्रवेश पास। भट्टजी के लिये यह कोई बडी बात नहीं थी। बोले नो प्रोब्लम। चाय-पकौडे खाओ। और फिर उन्होने बताया कि किस तरह विधानसभा की समृद्ध लायब्रेरी विधायकों की उदासीनता का शिकार है।विधायक उसका उपयोग ही नहीं करते। इसलिये उन्होंने पत्र लिख विधायकों से आग्रह किया है कि वे पुस्तकालय का उपयोग करें!

पत्रकार कोई प्रतिक्रिया दे, उससे पहले ही उन्होंने कहा कि पूर्व विधायक भी विधानसभा का अंग हैं। भट्टजी उनके अनुभव और ज्ञान का पूरा उपयोग करना चाहते हैं। और उन्होंने इन पूर्व विधायकों के लिये विधानसभा लाउन्ज में बैठने की इजाजत दे दी हैं!!

भट्टजी का मूड देख पत्रकारों ने कहा कि विधानसभा कैन्टीन सब्जी मार्केट जैसी हो गई है। पत्रकारों को बैठने के लिये जगह भी नहीं होती। कुछ करो। भट्टजी बोले तथास्तु। और जैसे ही पत्रकार इस हफ़्ते कैन्टीन में गये उन्होंने देखा कि कैन्टिन में पत्रकारों के लिये एक अलग पार्टींशन हो गया था!!!

मोदीजी के राज में पिछले पांच वर्षो में अपने भट्टजी सुर्खीयां तो मार लेते थे, पर पहले की तरह पत्रकारों के साथ भोजन मिलन नहीं कर पाते थे। वो क्या किसी भी मंत्री की हिम्मत नहीं थी कि मोदीजी के जुबानी फरमान का उल्लंघन कर पत्रकारों के साथ चाय भी पी ले। खाने की बात तो छोडो। मोदीजी ने सबकी बोलती बंद कर रखी थी।

खैर अब तो अपने भट्टजी अध्यक्ष सर्वोपरी हैं। जिस दिन अध्यक्ष बने तब पत्रकारों को नये घर पर खाने पर बुला लिया। और विधानसभा के तीसरे दिन ही पत्रकारों को सर्किट हाऊस में दावत का ऐलान किया।

अपने भट्टजी तो गृह में और गृह के बाहर पूरी तरह से प्रोफेशनल हैं। खाने से पहले पत्रकारों से दो मिनट के लिये मिले। बोले मैंने २९ फरवरी से तीन दिन के लिये ज्ञान शिविर का आयोजन किया है। गुजरात और बाहर से विभिन्न विषयों के विद्वान विधायकों को संसदीय इतिहास, परम्परा और प्रणाली से अवगत करायेंगे।

पूरे देश में पहली बार। लोकसभा के अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी खुद आयेंगे इस शिविर में भाग लेने। देखा अपने मीडिया मास्टर भट्टजी की सुर्खीबाजी की दक्षता!!!! क्या कोई रिर्पोटर इस खबर को मिस कर सकता है। और भट्टजी का माल पानी जीमने के बाद पत्रकार यह राष्ट्रीय समाचार बनाने में लग गये।
Post this story to: Del.icio.us | Digg | Reddit | Stumbleupon