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Thursday, June 28, 2007
सावधान अहमदाबाद में आतंक यात्रा आ रही है
Wednesday, June 27, 2007
गुजरात विद्यापीठ को एक अदद गांधी की तलाश
और अगर हम मुन्नाभाई प्रभाव को देखें तो अभी एक पीढी की खेप के बाद ही थोडा पका हुआ गांधीवादी मिल सकेगा। क्या इसका कोई हल है या नही, या फ़िर गुजरात विद्यापीठ हेड्लैस रहेगी ?
Tuesday, June 26, 2007
एक सनसनीखेज हत्याकांड का विवादास्पद फ़ैंसला
Monday, June 25, 2007
गुजरात की बसों में सूचना क्रांति
अब यह बस सेवा एक नई सुविधा लाई है । SMS करो और बस का टाईम टेबल जान जाओ । एक साथ उस रूट की पांच बसों की जानकारी । लेट भलें हों, जल्दी तो नहीं आयेंगी । आप आराम से मूंगफ़ली खाते हुए बस की राह देख सकते हैं । इस निर्मल गुजरात वाले वर्ष मे सभी बस स्टेंड अच्छे बनाये जा रहे हैं ।
यह सब जानकारी देने के लिये ST के अध्यक्ष अलोरिया जी ने पत्रकारों को बुलाया। लेपटोप से सज्ज उनका स्टाफ़ उनकी सेवा मे हाजिर । लेपटोप के काफ़ी कान मरोडे। उसकी पूंछ मरोड उसे सीधे रास्ते पर लाने की कोशिश भी की । पर अडियल टट्टू की तरह वह तो टस से मस न हुआ। किसी ने फ़िकरा कसा, सरकारी बस की तरह सडक पर ब्रेकडाउन !
तुरंत उनके साथ के बाबू का जवाब आया- मौसम मे उमस ज्यादा है इसलिये ये लेपटोप काम नही कर रहा । अरे भैये जब साहब के एअर कंडीशन्ड कमरे मे ये हाल है तो बाहर क्या होगा । खैर अलोरिया साहब ने खुद ही जबान और हाथ हिला ओडियो विज्युअल प्रेसेन्टेशन दे काम चला लिया ।
अपने अलोरिया साहब ने समझाया कि स्टाफ़ फ़ोन पर सही जवाब नही देता था इसलिये यह एसएमएस व्यवस्था लाये हैं । अब यात्री और टाइम टेबल के बीच कोई स्टाफ़ नही । भैये ये तो हम बाबु के जवाब से ही समझ गये थे ।
पर कम्प्यूटर को कम्प्यूटर तो नही चलायेगा !!! उपर से एसएमएस के पैसे तो ग्राहक की जेब से ।
सुनीता विलियम्स का यान मोदी विरोधी खेमे मे

वे गुजरात की है कयोकि उनके पिताजी गुजरात के है। भले ही वे अब तक केवल दो बार ही गुजरात आई है, पूरा गुजरात उन पर इस तरह फ़िदा हो रहा है जैसे कि वो अट्लांटिस का दरवाजा गुजरात में खोल कर ही चढी थी । आखिरकार हमारे मोदीजी ने हर गुजराती को हर उस चीज पर खुशी मनाना सिखलाया है जो किसी भी तरह गुजरात से जोडी जा सकती है।
अपने मोदीजी आज के मार्केटिंग गुरु है। वे दुनिया के बाजार में ब्रान्ड गुजरात काफ़ी अच्छी तरह से बेच रहे है। इसमे कुछ बुरा भी नही है। और आज सहकारी बैन्को से ले चेम्बर ओफ़ कोमर्स तक सभी इस मोदी ज्वार में आन्दोलित है। पूरा गुजरात vibrant गुजरात हो गया है । पर सुनीता विलियम्स एक ऎसा नाम है जिसके गुजराती कनेक्शन के बावजूद मोदीजी चुप है।
उनकी इस चुप्पी के कारण गुजरात के राजनैतिक गगन में वक्त वक्त पर कान्ग्रेसी आंधी के बादल आते रहते है। कान्ग्रेस के लिये सुनीता शब्द मोदीजी को खामोश करने का ब्रह्मास्त्र बन गया था बजट सत्र में । मोदीजी जैसी दाढी वाले कान्ग्रेस के अर्जुन मोढ्वाढिया जी ने बजट सत्र में तीन बार सुनीता विलियम्स के सम्मान का मुद्दा उठाया, पर खुद ही बोल बोल कर चुप हो गये क्योकि मोदीजी ने मौन धारण कर रखा ।
आज गुजरात के अखबार में सुनीता के समाचार है । पहले भी कई बार आ चुके है । मोदीजी को तो छोडो उनके स्वास्थ्य मन्त्री सनसनी सम्राट अशोक भट्ट भी चुप है। वो सुर्खियो में आने के किसी भी मौके को नही छोडते है। वो दुनिया की सबसे सात्विक चीज में भी कुछ ना कुछ भयानक ढुंढ लेते है। एक बार विधानसभा में बोले कि गुजरात मे मच्छर इसलिये ज्यादा है क्योंकि पाकिस्तान सरहदी जिले बनासकांठा में पानी छोड रहा है। यह उनका जवाब था जब किसी ने मलेरिया के बारे मे प्रश्न किया !
कुछ दिन पहले विश्व गुजराती समाज ने एक प्रस्ताव पास कर सुनीता के लिये शुभकामनाए की और घोषणा की कि जब वे गुजरात आएगी तब उनका सम्मान किया जायेगा। इसी सप्ताह कान्ग्रेस ने प्रस्ताव पास कर सुनीता को शुभकामनाए दी। सुनीता के वापिस आने पर कान्ग्रेस ने उन्हे अभिनन्दन दिये ।कान्ग्रेसी नेताओं ने उन्हें थोक मे अभिनन्दन दिये । प्रदेशाध्यक्ष भरत सोलंकी से ले सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल सभी ने दिल खोल अभिनन्दन दिये ।
इधर विद्रोही आत्मा सूरत के भाजपा विधायक धीरुभाई गजेरा ने इस मुद्दे पर मोदीजी की शाब्दिक धुलाई कर डाली। गजेरा भैया गरजते हुए कान्ग्रेसी भाषा में बोले कि राज्य में कन्या शिक्षा का ढोल पीट्ने वाले और भ्रूण हत्या के विरुध्ध अभियान चलाने वाले मुख्य मन्त्री नरेन्द्र मोदी सुनीता के बारे में इस लिये मौन है क्योंकि वह उनके जानी दुश्मन स्व हरेन पंड्य़ा की ममेरी बहन है।
उल्लेखनीय है कि हरेन पंड्य़ा की हत्या गुजरात की राजनीति में एक ऎसी गुत्थी है जो आज भी भाजपा में राजनीतिक भूचाल खडा कर देती है। हरेन के पिता से ले कान्ग्रेस के नेता और बागी भाजपाई सभी मोदी धुलाई में हरेन हत्या की लाठी का दिल खोल उपयोग करते है।
साफ़ है कि इस चुनावी वर्ष मे कान्ग्रेसियों और बागियों के लिये सुनीता एक रोकेट लौन्चर बन मोदी विरोधी खेमे से निकलेगी ।
(मित्रों हम इस चिठ्ठे को साईबर स्पेस के गूगल चक्र मे बैठा घर आये ही थे कि आफ़िस से सह सम्पादक नेहा जी का फ़ोन आया कि टेलीफ़ोन के तारों से मोदीजी का सुनीता जी को हार्दिक अभीनन्दन का फ़ेक्स आफ़िस मे लेन्ड हो गया है । देखी मोदीजी की आपदा प्रबन्धन व्यवस्था । अब देखना है कि जोर कितना बाजुए कान्ग्रेस और बागियों मे है !!!!)
Friday, June 22, 2007
अहमदाबाद के जातिवाद की हकीकत
आज मेरे जीरो कोलम की प्रतिक्रिया मे संजीत त्रिपाठीजी की टिप्प्णी पढी। उसने मुझे लिख्नने के लिये साक्षात उकसा दिया। इसलिये मेरे प्यारे ब्लोगियों यदि आपको मुझसे कोई शिकायत हो तो जरुर कहियेगा पर यह भी याद रखियेगा कि इसके मूल मे संजीत भैया हैं! मेरा आपसे एक ही आग्रह है कि जब आप इस पन्ने पर आ ही गये है, इसे पूरा पढें। पूरे दिल से कामेंट दे, हम कामेंट मोडरेट नही करते। हमारा ई मेल ID भी हमारे परिचय मे है ।
सबसे पहले तो मैं मेरा परिचय देता हूं जिससे कि आप मेरे इन विचारों को मेरीं दृष्टि से पढ खुद के नजरिये से देख सके । हम हिन्दुस्तानियों के आम नजरिये से मैं आगरा उत्तरप्रदेश से हूं क्योंकि मेरे पिता और दादा यहां जन्मे,पले और बडे हुए थे। बचपन ननिहाल गुडगांव में बीता। अ आ ई से A B C D वहीं सीखी। कोलेज और उसके बाद की जिन्दगी अर्थात लगभग ३५ साल अहमदाबाद में ही गुजारे हैं।
जिन्दगी में सिर्फ़ शुध्ध पत्रकारिता ही की है। इसकी शुरुआत इन्डियन एक्सप्रेस में ट्रेनी के रुप में की, कई वर्ष इन्डियन इक्सप्रेस का चीफ रिपोटर रहा और इस दौरान गुजरात का चप्पा चप्पा धूमा। आज कल भी पत्रकारिता कर रहा हू। प्रिन्ट में हिन्दी दैनिक चौपाल और नेट में अंग्रेजी में http://www.gujaratglobal.com/.
काका कालेलकर को सवाया गुजराती कहा जाता था। आप मुझे भी सवाया गुजराती कह सकते हैं। अपने इस परिचय के साथ मैं यह कहना चाहूंगा कि रवीशजी जिस किस्से की बात कर अपने टीवी का प्रचार कर रहे है वह एक अपवाद के रुप में लिया जाना चाहिए। इस एक किस्से को शहर या प्रदेश पर नहीं थोपना चाहिए।
अनामदासजी से मेरी यह गुजारिश है कि वे उनके सोसायटी के नाम के अनुभव को जातिवाद जैसे घिनौने शब्द से न जोड़े।
इस जातिवाद बवाल को समझने के लिये जरुरी है कि हम अहमदाबाद में मकान बनाने के फंडे को समझें। सबसे पहले तो यह कि यहां लोग प्लोट खुद डेवलप नहीं करते। अहमदाबाद में ७५ वर्ष ( या कुछ और अधिक वर्ष) पूर्व पहली हाउसिंग सोसायटी बनी। यह पालडी क्षेत्र में बनी। इसका आधार था कुछ समान विचार वाले, आपस में विश्वास करने वाले लोगों का इकठ्ठा हो अडौस पडौस में रहना।
अगर आप किसी भी मोहल्ले से ले राष्ट्र की रचना तक देखें तो उसका आधार भौगोलिक कम और भाषाई और जातीय अधिक रहा है। गुजरात में सोसायटी का विचार पनपा और अलग प्रकार के समुहों और समुदायों के लोगों ने इस प्रकार के मकान निजी क्षेत्र में बनाने शुरु किये। स्वाभाविक है कि संवैधानिक मूलभूत अधिकार के समांतर यह विचार पनपा।
बाद में व्यवसायिक बिल्डर इसमें आये। इससे दो स्थितियां बनी। एक तो यह कि लोग स्वयं इकठा हुए और दूसरा यह कि बिल्डर ने जमीन के लिये खुद लोगों को इकठा किया। साफ है कि सोसायटी न बनाने वाले लोगों के समूह बिल्डरों की स्कीमों में भी गये।
दो दशक पहले तक अहमदाबाद मुख्यतः व्यापारियों का शहर था। इसमें मुख्यतः गुजराती और राजस्थानी व्यापारी थे। पैसे वाले थे और वे ही सोसायटी में पैसा लगा खुद के लिये नये घर का विचार कर सकते थे। नतीजा यह हुआ कि ये सोसायटी इन प्रदेश, भाषा और जाति आधारित समूहों का दुकान के बाद का समूह स्थल बन गये। एक ही जाति या गांव के लोगों के कारण व्यापरियों को धंधे के काम से बाहर जाने पर यह विश्वास रहता था कि उसके परिवार की सुरक्षा की कोइ चिन्ता नहीं है। साथ ही यह भी सुनिश्चित हो जाता था कि उसका परिवार उनकी जाति और प्रदेश के माहौल में ही पलेगा। क्या ये सब विचार अहमदाबाद में ही है। क्या दुनिया के अन्य प्रदेशों मे यह नही है?
रविशजी महानगरों में भी मोहल्ले हैं। अमरिका में चाईना टाऊन है। न्यूजर्सी में तो गुजराती ही भरे हुए हैं । लंडन में भारतीयों की बस्ती का प्रतीक है वै्म्बली क्षेत्र। हमारी सहसम्पादक नेहाजी पिछ्ले साल ही ब्रिट्न गई थी। बडी खुश हुई वै्म्बली में गुजरात देखकर। आई तो बोली वै्म्बली यानि कि अहमदाबाद का माणेक चौक। अहमदाबाद आए होंगे तो रवीशजी ने शायद माणेक चौक देखा हो। यह अहमदाबाद का चांदनी चौक है।
य़ह मूल मानवीय सुरक्षा का भाव इसलिये भी पनपा क्योकिं लोग मकान खुद बनाते थे। पर अब गुजरात हाउसिंग बोर्ड (डी डी ए, हुडा वगैरह का छोटा भाई) बना तब हर आदमी के लिये हर जगह (जेब में पैसा हो तो) वाले मकान बनने शुरु हुए।
रवीशजी जब आपनें अहमदाबाद में जातिवाद पर फ़ोकस किया तो कितने बिल्डरों से पूछा? तथाकथित नेताओं से इसका कारण पूछा? अरे भैये अपने कर्णधार संजय जी से ही पूछ लेते कि शाहीबाग मे राजस्थानी लोग ज्यादा क्यों रहते हैं ? राजस्थानियो की सोसायटी, उनके स्कूल और अस्पताल भी ।
आपने तो लोगों के विचारों पर यह सब लिखा। में खुद के अनुभव की बात करूंगा । मेरे पास अखबारनगर में मकान था। जब यह नगर बना तब केवल पत्रकारों के लिये ही यह था (सरकार की कोई रियायत नहीं थी) यह कौनसा जातिवाद है? आज वहां चंद पत्रकार हैं। बाकी हर जाति, प्रदेश के लोग हैं। अहमदाबाद मे विद्यानगर मे सभी पढने लिखने वाले ही क्यो रहते हैं ? दिल्ली का मयूर विहार, विवेक विहार, ऐसा क्यूं है ?
मैं साबरमती में रहता हूं जिसका उपनगर चांदखेडा है। मेरे फ़्लैट में सभी जैन रहते थे। जब मैने मकान लिया तब बिल्डर ने पूछा कि क्या मैं मांसाहारी हूं? कारण? बाकी सब जैन हैं। अब यदि कुछ लोग अपने खान पान और विचार व्यवहार के आधार पर एक साथ रहना चाहें तो आप इसे जातिवाद के चश्में से क्यों देखना चाह्ते हो? वैसे भैये हम शुद्ध शाकाहारी हैं ।
खैर कुछ वर्ष पूर्व हमारे फ़्लैट के एक मित्र ने उनका मकान एक बडे सिंधी व्यापारी को बेच दिया। बाकी जैन धुआं पूआं हो गये। उसने उन सभी को कहा कि मैं मकान बेचना चाहता हूं। वह व्यक्ति अच्छा पैसा दे रहा है। तुम अगर थोडा कम भी दे दो तो तुम्हे बेच दूं । कोई तैयार नहीं हुआ। हमारे फ़्लैट में अब जैन के अलावा यह ब्राह्मण पत्रकार और सिंधी व्यापारी भी है। वैसे फ़्लैट का नाम देवदर्शन है, जैनदर्शन नहीं।
मैं केवल यह कहना चाहता हूं कि हाउसिंग सोसायटी का विचार एक विशेष समूह के लोगों के एक साथ रहने के कारण पनपा । आज अन्य प्रदेश जहां अभी भी जमीन का प्लोट ले मकान बनवाते हैं यह समूह भावना एक अकल्पनीय विचार हैं। अगर वहां भी यह व्यवस्था शुरु हो तो आपको ऎसी ही सोसायटी मिलेंगी ।
इन्टरनेट पर विभिन्न ग्रुप क्या इसी समूह भावना का प्रतिबिम्ब नहीं हैं। मेरा सभी ब्लोगिया मित्रों से आग्रह है कि हम इन चीजों को उनके संपूर्ण स्वरुप में देखें। जाति आधारित समूह खराब और बाकी सब अच्छे । यह कैसी उल्टी पुल्टी सोच है?
रवीशजी स्टोरी फिर भी बनेगी। अहमदाबाद की सोसायटियों के रसप्रद नाम और उनमें रहने वाली मजेदार भारत की बस्तियां। पर इसके लिये थोडा टाईम निकालना पडता है और अपने सीमित परिचितों के घेरे से निकल तरह तरह के लोगों से मिलना पडता हैं।
आप ओ हेनरी की कोस्मोपोलिटन पढे। एक व्यक्ति जो खुद को कोस्मोपोलिटन बता रहा था वह उसके गांव के बारे में एक व्यक्ति से एक होटल में लड मरा। व्यक्ति की किसी न किसी प्रकार के समूह में रहने की वृति उसकी वास्तविक असुरक्षा की भावना से इतनी गहरी जुडी है कि हर समाज, देश और समूह में हर समय रहती हैं। और ऎसे में अहमदाबाद को जातिवाद की गाली दे क्यो बदनाम करते हैं।
जे क्रृष्णमूर्ति ने कहा है कि मूलभूत असुरक्षा से भागने के लिये मनुष्य गुट बनाता है और इसकी शुरूआत परिवार नाम की संस्था से होती है और इसकी पराकाष्ठा राष्ट्रवाद है ।
Thursday, June 21, 2007
मोदी जी की प्रतिभा पाटिल को गुगली
अगर नही बन पाई तब भी इतिहास मे तो अमर हो ही गई । अब जब भी राष्ट्रपति का चुनाव होगा अपने पत्रकार मित्र अपने डेटा बेज मे से या फ़िर गूगल सर्च मे से प्रतिभा जी का कच्चा चिठ्ठा निकाल लिखेंगे कि किस प्रकार उनके चुनाव के समय एक तीसरा मोर्चा खुला था ? प्रतिभा जी को हराने के लिये भाजपा वाले अपने ही शेखावत जी को निर्दलीय बना रहे है। यू कहो कि निर्वस्त्र कर रहे हैं । तीसरा मोर्चा कलाम साहब के कन्धे पर बन्दूक रख प्रतिभा जी पर गोली दागने मे लगा हुआ है ।
यह सब भविष्य के पत्रकारों के लिये वो मसाला है जो गीगा बाइट मे अलग अलग सजाल मे इकठ्ठा हो रहा है ।आज अपने भाई लोग लक्ष्मी सहगल के बारे मे लिख रहे हैं, फ़िर लक्ष्मी सहगल और प्रतिभा जी के बारे मे लिखेंगे। कहने का अर्थ है कि उन्होने इतिहास बना लिया । खैर हम यहा हमारे नरेन्द्र मोदीजी के विचार दर्ज करने बैठे है। वो हमारे इसलिये हैं क्योकि हम उनके पांच करोड गुजरातवासियो मे से एक है। वैसे हम आपको बता दे कि पिछले पांच वर्ष से पांच करोड की रट लगाने वाले अपने मोदी जी ने अपने पिछ्ले भाषण मे यह संख्या बढा कर साढे पांच करोड कर दी थी।
मोदीजी की मुख्यमन्त्री बनने के बाद से यह शिकायत है कि मीडिया उनके अच्छे विचार नही लिखता है। उनके २०६३ दिन पूरे करने के उपलक्ष्य मे आयोजित कार्यक्रम मे तो उन्होने खुल कर कह दिया कि मैने इन्हे( मीडिया) पांच वर्ष झेला है, आप इन्हे थोडा समय झेलें । उन्होने यह भी कहा कि अगले छह महिने सत्य की आशा छोड दो इनसे।
अपने मोदी जी ने प्रतिभा जी के सामने तीन शर्ते रखी हैं । पहली तो यह कि वे विदेशी मूल के व्यक्ति के प्रधान मन्त्री न बनने दें, दूसरा यह कि वे अफ़ज़ल को फ़ांसी लगवाये और तीसरा यह कि वे महिला आरक्षण विरोधी लालू यादव का मत ठुकराये । देखी अपने मोदीजी कि प्रतिभाजी को गुगली । हम चाहते हैं कि भविष्य मे जब राष्ट्रपति पद के लिये कोई विवाद जागे तब मोदीजी के इस त्रिशूल विचार का ध्यान जरूर रखा जाये । व्यंग्य