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Monday, February 24, 2014

गुजरात के विपक्षी नेताओं का नमो हृदय परिवर्तन दौर

आजकल गुजरात की राजनीति में एक नया दौर आया है। नमो दौर। विपक्षी नेता इसमे बहते बहते कमल के सागर में आ रहे हैं । जो मोदी को राजनीति का भाई कह अलग चौका लगा बैठे थे वे अब “अपने हृदय” की बात सुन नमो के पास आ रहे हैं।

गोरधनभाई की कृष्ण लीला
हर सांस में मोदी को कोसने वाले अपने गोरधनभाई ने आज अपनी कृष्ण लीला दिखलाई। वे अपने पूरे दल गुजरात परिवर्तन पार्टी के साथ भाजपा में आ गये। हकीकत में तो गोररधनभाई और उनके साथी भाई वापिस उनकी मातृ संस्था भाजपा में वापिस आ गए ।
गोरधन भाई काफी चतुर और वाक पुट वाले व्यक्ति हैं। हर सवाल का जवाब तैयार है। बोले अपने गुजरात के मोदीजी देश के प्रधानमंत्री बन रहे है यह बड़ी बात है। बाकी सब कुछ गौण और फिर उन्होने मीडिया को बताया कि यह किस प्रकार राष्ट्र हित की बात है।
मोदीजी के सामने भ्रष्टाचार के उनके आरोपों को जब पत्रकार मित्रों ने याद दिलाया तब तपाक से जवाब आया मोदीजी ने इस मुद्दे पर जांच बैठा दी है और जो भी बाहर आएगा वह सत्य होगा। बोले परिवर्तन पार्टी के विलीनीकरण के लिए सब तैयार हैं।
इस पार्टी के संस्थापक केशुभाई जिन्होने हाल ही में नादुरूस्त तबियत को आगे रख इस्तीफा आगे रख दिया था वो भी तैयार हैं। देखा जाए तो यह तो उनके इस्तीफे से ही साफ था कि वे विलीनीकरण को हरी झंडी दे रहे थे खुद को अलग रख कर। सब कुछ गोरधनभाई सम्भालें।
केशुभाई के साथ यही सबसे बड़ी समस्या है। कभी आगे से वार करने या लीडरी करने में वे मानते ही नहीं है। इसका यह परिणाम रहा कि उनके भाजपा में रहते हुए ही उनके अधिकतर साथी मोदीजी के चौके में दावत का मजा लेने में लग गए। और जब उन्होने भाजपा छोड़ी तो वे अकेले ही थे।

एक रु के भी नहीं हैं सुरेश महेताजी
रही बात अपने पूर्व मुख्यमंत्री सुरेश महेताजी की। उन्होने इस विलीनीकरण का जम कर विरोध किया है। गोरधनभाई से जब इस मुद्दे पर प्रश्न किया तो बड़ी बेबाकी से बोले, सुरेशभाई बड़े अच्छे व्यक्ति हैं। पर उन्होनें इस परिवर्तन पार्टी में एक रु का चंदा भी नहीं दिया है। लो सुरेशभाई देखो आपकी क्या हैसियत है। एक रु के भी नहीं हैं आप।
आज अपने दो कांग्रेसी भाई भी मोदीजी के कमल मैदान में उतरने के लिए तैयार हो गए। इन दोनो विधायकों ने आज विधान सभा अध्यक्ष वजुभाई वाला को इस्तीफा दे दिया। पहले तो विधायक प्रदेश अध्यक्ष या फिर विधायक दल के नेता को इस्तीफा दे थोड़ा बहुत रूठने मनाने की जगह भी रखते थे। अब तो उनके इस्तीफे से ही प्रदेश अध्यक्ष और विधायक दल के नेता को मालूम पड़ता है कि बंदा गायब।
इनमे एक थे अपने छबील पटेल। पूर्व मुख्यमंत्री सुरेश महेता को उनकी पिच कच्छ की मांडवी में हरा विधान सभा में एन्ट्री मारी थी उन्होने। और इस बार कच्छ के ही अबडासा से विधान सभा में आए। कच्छ के मशहूर हरे खजूर को देश में लोकप्रिय बनाने वाले अपने छबीलभाई को मालूम नहीं कि कमल में कैसे खजूर दिखे कि वो दौड़े दौड़े नमो प्रवाह में कूद गए।
भाजपा में हजूरिया- खजूरिया युद्ध कराने वाले उनके गुरू शंकरसिंहजी ,जो अब कांग्रेस विधायक दल के नेता हैं , उन्हे सोनियाजी के राजनीतिक सलाहकार को जवाब देना भारी पड़ा कि छबील कैसे कांग्रेस की आबरू लील कर चला गया!

प्रभु वसावा, कांग्रेस का सूरत जिला के मांडवी का विधायक, दोपहर को दौड़ कर अध्यक्ष के पास गया और इस्तीफा दे आया। पश्चिम में छबील और दक्षिण में प्रभुजी, सब नमो नमो।

Thursday, August 23, 2012

मोदीजी को भी महंगाई सताई


अपने मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदीजी महंगाई पर कांग्रेस पर वार ऐसे ही नही करते. वास्तव मे महंगाई उन्हें काफी सता रही है. अब देखिये बुधवारी मे उन्हे अपने साथी मंत्रियों को नाश्ता कराना पडता है. बुध्वारी यानी मंत्रीमंडल की बैठक का दिन. हमारे देश की अतिथी देवो भव की भावना के देक्श्ते हुए कोइ भी मुलाकात चाय नाश्ते के बगैर मुलाकात ही कैसी.
पर इस नाश्ते के लिये पैसे तो देने पडते हैं सरकारी तिजोरी से. उसके लिये सरकारी आदेश भी जरूरी है. नया आदेश निकला है कि अब सरकारी मीटिंग मे एक प्लेट का दाम होगा १८० रुपये. हाल मे यह दाम है ७५ रुपये. अर्थात दाम मे दो गुना से भी अधिक की बढोतरी.
फिलहाल राज्य मे सूखे की स्तिथी को देखते हुए अगर बुधवारी ओफ व्रतवारी बना देते तो एक साथ दो काम हो जाते. एक नये अंदाज के लिये पहली बार के टाईटल वाले समाचार बन जाते और खर्चा भी कम हो जाता. पर मोदीजी तो मोदीजी है, उन्हे कौन भांप सकता है. कब क्या कर डाले ये या तो मोदीजी जाने या राम जाने !!!!

Monday, October 29, 2007

मोदी जी के मौत के सौदागर

अभी कुछ देर पहले ही अपने मोदीजी का इंटरव्यू सहारा चैनल पर देखा। लगा कि मोदीजी से पहले तो सभी मुख्यमंत्री घसियारे थे। अपने मोदीजी तो विकास पुरूष है। पूरा गुजारात उनका परिवार है। I love Gujarat ही दिख रहा था।

अपने इंटरव्यू लेने वाले प्रसूनभाई की अपने भाई के साथ उनकी दाढी के अलावा और भी कई समानताये देखने को मिली। अपने गुजरात के साढे पांच करोड के एक मात्र भाई नरेन्द्र भाई की तरह वे भी काफ़ी विकास केद्रित लगे। इंटरव्यू मे वे मोदीजी के विकासशील पहलू को उभारने मे उनकी पत्रकारिता की सभी दक्षताऒ को लगा रहे थे। सही बात है कि इंटरव्यू लेने वाले को सामने वाले के अच्छे पहलू उभारने चाहिये.

और अपने मोदीजी भी शांति से हर बात का उनके अपने अंदाज मे जवाब दे रहे थे। लगता नही था कि मोदीजी कभी किसी पत्रकार से बदसलूकी कर सकते है। चेहरे पर एक मुस्कान, होठो पर प्रजा को समर्पण के बोल। जरूर राजदीप बडा बदतमीज आदमी होगा जो अपने मोदीजी को गुस्सा आ गया। करण थापर ने जरूर बद्सलूकी की होगी जो अपने शांत और सौम्य मोदीजी इंटरव्यू छोड चले गये होंगे।

प्रसूनजी ने भी विवादास्पद सवाल किया। आखीर यह इंटरव्यू असली था। उन्होने पूछा २००२ के दंगो का क्या? मोदीजी ने बताया कि उसके बाद चुनाव भी हुए और वो जीत कर आये। और फ़िर मोदीजी शुरू हो गये "मै मौत के सौदागरों को नही छोडूंगा"। प्रसून ने अंग्रेजी स्कूल के अच्छे छात्र की तरह हिंदी मे सवाल किया। फ़र्जी मुठभेड का क्या? पर मोदीजी तो बोलते ही रहे। "मै मौत के सौदागरों को नही छोडूंगा"। कई बार दोहरया। प्रसून्जी भक्ति भाव से उनके विकास पुरूष के सुनते रहे। चुपचाप अच्छे बच्चे की तरह।



राम जाने मोदीजी के मौत के सौदागर कौन हैं!!!!!!!

Tuesday, June 26, 2007

एक सनसनीखेज हत्याकांड का विवादास्पद फ़ैंसला

आज अहमदाबाद में हरेन पंडया की चर्चा जोर शोर से है। भाजपा नेता हरेन पंडया की हत्या ने २००३ मे जितनी सनसनी पैदा की थी , उसके फ़ैसले ने उतना ही बडा विवाद खडा किया है। कोइ भी खुश नही। न तो हरेन के परिवार वाले और न ही जिन्हे सजा हुई है।
इस किस्से मे नौ को आजीवन कैद हुई है, दो को ५ साल की सजा और एक को सात साल। हरेन को सुबह उसकी कार मे गोली मार दी गई थी। हरेन और मुख्य मन्त्री नरेन्द्र मोदी की राज्नीतिक दुश्मनी पराकाष्ठा पर थी। मोदी की जिद्द के कारण भूतपूर्व गृह मन्त्री हरेन को टिकट नही मिली थी।
हरेन पंडया की पत्नी और पिता का कहना है कि सी बी आई ने बराबर जांच नही की है इसलिये फ़ैंसला सही नही है। उधर जिन बारह को सजा हुई है उनका कहना है कि उन्हे सजा इसलिये मिली है क्योकि वे मुसलमान हैं ।
हरेन के पिता का तो कहना है कि यह राजनीतिक आतंकवाद का किस्सा है और इसके सूत्रधार मुख्य मन्त्री नरेन्द्र मोदी हैं और उन्हे सजा होनी चाहिये । उधर हरेन की पत्नी मुख्य मन्त्री नरेन्द्र मोदी से मिल दोबारा जांच की मांग कर रही है।
यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक है ।पिछले तीन वर्षॊं मे हरेन नाम संज्ञा से क्रिया विशेषण बन गया है । किसी का हरेन पंडया कर देना मतलब उसका खातमा कर देना । किसी जमाने मे हरेन की तरह मोदी जी की विश्वस्त और आज उनकी जानी दुश्मन भाजपा विधायक रमीला देसाई कहती हैं कि उन्हें मोदी खेमे से धमकी मिलती है कि उनका हरेन पंडया कर दिया जायेगा ।
मोदीजी के विरोधियों के लिये यह महत्वपूर्ण है क्योकि यह उन्हे मोदीजी के विरुद्ध बोलने के लिये मसाला देता है। और मोदी भक्तो के लिये यह उनके गुणगान का मसाला है कि देखा हमारे गुरु क्या कर सकते हैं । सच तो राम जाने, हम तो वो कहते है जो गुजरात आज कह रहा है ।

Friday, June 8, 2007

एक शाम के अखबार का पचासवां साल

किसी के भी जीवन मे पचास वर्षों का सफ़र बहुत मायने रखता है। अखबार की दुनिया मे तो यह और भी महत्वपूर्ण है। और अगर अख़बार शाम का अख़बार हो तो यह एक एतिहासिक घटना है। और यह इतिहास रचा है गुजरात के अखबार नोबत ने। इस वर्ष जामनगर शहर से निकलने वाला यह अख़बार पचासवें साल मे आ गया।

सौराष्ट्र क्षेत्र के अन्य कई जिलो की तरह, जामनगर में भी कोई सुबह प्रकाशित होने वाला अखबार नही है। पर यहाँ पूरे सात अखबार हैं जो दोपहर में निकलते है। नोबत जामनगर का ही नही पर गुजरात में फिलहाल प्रकाशित होने वाला सबसे पुराना दोपहर का अखबार है। आज जब दुनियाभर में दोपहर के अखबार सुबह के अखबारो की अपेक्षा कम गम्भीर और ज्यादा मसालेदार माने जाते हैं तब नोबत की गिनती एक प्रतिष्ठित अखबार के रुप मे होना अखबार का स्तर बताता है।

पचास वर्ष पूर्व रतिलाल माधवानी ने यह अखबार राजकोट शहर में एक पत्रिका के रुप में शुरू किया थान जो जामनगर में एक संध्या दैनिक बन कर उभरा और आज रतिलाल्जी के पुत्र दीपक माधवानी इसे संपादित कर रहे हैं.

यह एक ऐसा अखबार है जिसके पास ए बी सी प्रमाणपत्र है। आज कई बडे अखबारों के पास भी यह प्रमाणपत्र नही है। यह सब यह बतलाता है इसके पचास साल की कहानी। और शायद यही एक कारण था कि इस गुरुवार को अपने मुख्यमंत्री नरेन्द्रभाई ना केवल इसके स्वर्ण जयंती समारोह मे आये पर काफी देर रुके भी। आदतन उन्होने यहाँ भी मीडिया धुलाई कार्यक्रम बरकरार रखा।
वो बोले कि आज सौराष्ट्र बंद के समाचार अलग अलग अखबारों मे अलग अलग छापे हैं। एक कह रह है कि यह ग्रेट शो है तो दुसरा कह रह है कि ये फ्लॉप शो है। अब बेचारा पाठक क्या सोचे ? अब अपन मोदीजी को क्यां बतायें कि कितने लोग एक अखबार भी इतनी गम्भीरता से पढ़ते है, दो की तो बात छोडो । खैर मोदीजी तो मोदीजी हैं। जब से मुख्यमंत्री बने हैं मीडिया धुलाई उनकी रणनीति है।

बात चल रही थी नोबत के स्वर्ण जयंती कार्यक्रम की। जामनगर को गुजरात में हलार प्रदेश के रुप में जान जाता है। और हलार के हीर कार्यक्रम के द्वारा नोबत ने ३९ उन जामनगर वालों का सम्मान किया जिन्होनो इस शहर को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलवाई है। यहाँ के राजसी परिवार के जाम साहेब ऑफ़ जामनगर शत्रुशाल्यासिंघजी , गुजरे ज़माने के मशहूर क्रिकेटर सलीम दुर्रानी से ले आज के नए जामनगर के शिल्पकार रिलायंस के परिमल नाथवानी और एस्सार के सुखदेवसिंह सभी का सम्मान। यह कार्यक्रम एक तरह की जामनगर की डायरेक्ट्री बन रहा। अतीत से आज तक जामनगर एक मंच पर उभर आया.
शाम तो सौराष्ट्र के सुन्दर स्वरूप को लेकर आयी थी । यह थी मनहर उदास की एक ग़ज़ल की शाम। मनहर वो गायक है जिसने गुजरती ग़ज़ल को एक पहचान दीं है। और इधर नोबत ने दोपहर के अखबारों को एक नै पहचान दीं है.

Friday, May 4, 2007

नेताओं का अम्बेडकर प्रेम

अपने नेताओं का क्या कहना। समय के साथ बदलना तो कोई इनसे सीखे। जीवन परिवर्तनशील है यह तो सभी कहते हैं। पर यह सत्य जीता कौन है ? हमारे नेताजी! मौसम के साथ बदलते हैं वो अपना रंग रुप। ये साल चुनावी साल है। सभी को दलित, आदिवासी याद आ रहे हैं। अपने कांग्रेसियों को मुस्लमान भी याद आ रहे हैं। भाजपियों को मुसलमान अलग रुप में याद आ रहें हैं। खैर ये तो लंबी कहानी है।

अपनी बात तो है कक्काजिओं के अम्बेडकर प्रेम की। हर साल १४ अप्रैल को एक तरफ फायर ब्रिगेड दिन मनाया जाता है तो दूसरी तरफ भीम दिवाली। वैसे भी दिवाली और फायर ब्रिगेड के बीच गहरा नाता है। दिवाली के दिन बेचारे फायर ब्रिगादेवालों की नींद हराम हो जाती है। अपनी बात तो अम्बेडकर प्रेम की है।

इधर अपने पांच करोड़ गुजरातियों के मोदी भाई ने पन्ना भर के अम्बेडकर जीं का विज्ञापन दे दिया । मोदिजी का फोटो ना हो तो विज्ञापन कैसे हो सकता है। बडे अम्बेडकर , उनके बाद भाई नरेन्द्र भाई और फिर अपने रमनलाल वोरा भाई । क़द कुछ भी हो, कमाल तो क्रम का है। अपने मोदी जी अपनी बिनाका मुस्कराहट के साथ बीच में । आपकी नजर सीधे उन्ही पर पड़े।

अखबारों को हमेशा कोसने वाले अपने नरेन्द्र भाई का विज्ञापन प्रेम जोर शोर से उभर रह है। उनके सरकारी सपताहिक गुजरात की लाखों कापियां छपती हैं, भी
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