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Wednesday, June 20, 2007

महानगर अहमदाबाद की व्यथा कथा

अहमदाबाद को मेट्रो का दर्जा मिले समय हो गया है। हमे आज तक समझ नही आया कि मेट्रो बनने से अहमदाबाद को मिला क्या? हमे तो लग रहा है कि अहमदाबाद जितना फ़ैलता जा रहा है उतनी ही इसकी दिक्कते बढ्ती जा रही हैं ।

आज शाम एक घंटे बरसात क्या हुई, शहर की जिन्दगी ठप्प हो गई। जगह जगह पानी भर गया। लोग घूम घूम कर घर जाने का रास्ता ढूंढ्ने लगे । सभी जगह पानी । जिन्हे मन्त्रियो की लाल बत्ती वाली गाडी देख ईर्ष्या होती है उन्होने भी देखा की राज्यपाल की लाल बत्ती वाली गाडी भी थोडे से पानी मे रूक गई । वर्दी वाले पुलिस वाले भी कुछ नही कर पाये ।

मालूम है कि अहमदाबाद मे कितनी बरसात हुई ? पश्चिम क्षेत्र मे दो इंच और अन्य सभी मे एक इंच से कम । अब अगर हमारे इस मेट्रो मे एक घन्टे की बरसात यह जुल्म ढा सकती है तो मूसलाधार बरसात मे तो क्या हालत होगी । वो भारी भरकम शब्द वाला स्टोर्म वाटर ड्रेनेज भी अर्थहीन हो गया। हर साल नगर निगम उसके प्री मानसून प्लान की घोषणा करती है और हर साल वह पहली बारिश मे धुल जाता है। अपने नगर निगम वाले देश की अनोखी रिवर फ़्रंट योजना लाये है। देश का सबसे पहला बी आर टी ऎस अहमदाबाद मे शुरू होने वाला है । सचमुच मे अपने इस कर्णावती महानगर के लिये गर्व की बात है। पर भैये वर्षो पुरानी पानी निकालने वाली गटर व्यवस्था का क्या ?

Tuesday, June 19, 2007

हमारी मासी की अखबारी समस्या

हमारी मासी हमारी मासी है। हमारा कहने का मतलब है कि वो अपने अमिताभजी की शोले वाली मौसी नहीं हैं । आजकल इस प्रकार की स्पष्टता बहुत जरूरी हैं ।

हमारी मासी पढने लिखने की बहुत शौकीन । प्रोफ़ेसर जो ठहरी। आजकल रिटायर्ड हैं । घूमती फ़िरती अहमदाबाद चक्कर लगा लेती हैं । आजकल यही है । गुजराती अखबार पढने का उनका शौक हमारे लिये कैसी कैसी समस्याऎ खडी कर देता है यह तो आप अनुभव करके ही जान सकते हैं ।

अपनी हिन्दी ठहरी सीधी सादी भाषा, जैसी बोली वैसी लिखी। अरे भैये वही जिसे फ़ोनेटिक कहते हैं अंग्रेजी मे। गुजराती मे मात्रा के नियम ही अलग है । उन्हें सब कुछ गडबड लगता है । खैर इसके लिए तो हमारे पास हाजिर जवाब है- गुजराती मे तो ऎसा ही होता है । वो भी मान लेती हैं । अगर उनकी जान पहचान का कोइ प्रोफ़ेसर होता तो शायद इस मुद्दे पर बहस कर लेती। समय भी कट जाता और पुराने प्रोफ़ेसरी के दिन भी ताजा हो जाते। खैर, वो सुबह सुबह एक दर्जन अखबार पढ कर चला लेती हैं ।

पर उनकी दूसरी समस्या ऎसी है, जो आपको भी कभी आयी हो। इस प्रकार की समस्या उन्हे आये दिन आती है। आज सुबह ही पूछ बैठी । भाजपा के बेचर भादाणी को पार्टी का नोटिस मिला या नही ? हम चक्कर मे पडे। देवीलाल और भजनलाल की बात करने वाली हमारी दिल्ली मासी को गुजरात की राजनीति मे यह कैसा रस ? खैर भैये राजनीति का भूत तो ऎसा है कब कैसे किसी पर चढ जाये कोई कुछ नही कह सकता। चुनाव के समय देखो कैसे कैसे लोग चुनाव मे खडे होने को तैयार होते हैं । पार्टी की टिकट न मिले तो निर्दलीय खडे हो जाते है ।

हमने पूछा कि बेचारे भादाणी से उन्हे क्या समस्या है। वो बोली एक अखबार मे लिखा है कि उसे नोटिस मिल गया है, दूसरे का कहना है कि अभी नही मिला। पर दोनो अखबार यह कहते हैं कि उसके तेवर अभी भी नरेन्द्र मोदी के खिलाफ़ हैं । हमने कहा की हमे तो मूल हकीकत पर जाना चाहिये की भादाणी की चाल बदली या वैसी ही है। रही बात नोटिस की वो आज नही तो कल मिल जायेगा। रूपालाजी ने जब भेजा है तब भादाणी को जरूर मिलेगा ।

अभी चैन की सांस ली ही थी की उनका दूसरा सवाल आया । फर्जी मुठभेड़ के किस्से मे पोलिस अधिकारी अमीन का क्या हुआ ? उसने तो जमानत ले ली थी । हम अवाक , ये मासी को क्या हो गया ? पहले पोलिटिक्स और अब पोलिस ।पूछा क्या बात है बोली कुछ नही , वो तो एक अखबार मे लिखा है कि वो गिरफ्तार हो गया और दूसरे मे लिखा है कि पूछताछ के बाद उसे जाने दिया । हकीकत क्या है?

अब क्या कहते ? कहा कि मालूम करना पडेगा । एक मास्टर की तरह उन्होने पूछा कि तुम पत्रकार करते क्या हो ? अरे भई यह सब तो तथ्य और आंकडो की बात है । इसमे अंतर कैसा ?
अब उन्हें कैसे समझाते की पत्रकार आलम का माजरा क्या है !! अपने मुख्य्मन्त्री नरेन्द्र मोदी भी चक्कर मे पड गये थे । हाल ही मे जामनगर गये थे । उस दिन उस क्षेत्र मे बाजार बंद का ऎलान था । एक अखबार ने लिखा था बाजार बन्द सफ़ल तो दूसरे ने लिखा था फ़्लोप शो । सच्चाई तो राम जाने।

Monday, June 11, 2007

श्री श्री रा धु प प्र २०६३ मोदी जीं

आप भी आश्चर्य मे होंगे कि मोदीजी के लिए यह कैसा संबोधन । चिन्ता मत करो मित्रों। हम किसी के बारे में खराब नही सोचते । यह बात अलग है कि लोग अपने हिसाब से मतलब निकाल तरह तरह का सोच लेते हैं। गुजराती मे एक संबोधन है। ध धु प पू अर्थात धर्म धुरंधर परम पूज्य । अपने मोदीजी तो मोदीजी हैं। वो धर्म का एक चेहरा हैं। वो तो उससे भी आगे हैं।

सुना है एम ए मे राजनीती शास्त्र उनका एक विषय था । गुजरात की राजनीती पर पुस्तक लिखने वाले डी ऍन पाठक उनके शिक्षक थे। पर उनकी राजनीती से साफ है कि वो किताबी ज्ञान से बहुत आगे है। अगर चाणक्य जिंदा होता तो वो भी मोदीजी से जरूर कुछ ना कुछ सीख ही लेता। अरे मोदीजी बिना किसी चाणक्य की मदद के पूरे २०६३ दिन से मुख्यमंत्री कार्यालय मे अड्डा जमाये हैं ।

भा ज पा अध्यक्ष राजनाथ सिंघ ने भी साफ कर दिया कि भले ही केशुभाई और उनके चेले मोदी हटाओ के उनके पांच साल से चल रहे कार्यक्रम में लगे रहें , पर अंगद के पाँव की तरह उन्हें कोई हिला नही सकता। वो चुनाव तक ही नही उसके बाद भी मुख्यमंत्री बने रहेंगे। केशुभाई भी सोचते होंगे कि अगर मोदी को दिल्ली वनवास नही दिलवाया होता तो ना तो उन्हें वनवास भुगतना पड़ता और ना ही मोदी जीं के दिल्ली के तार इतने मजबूत होते। खैर उनके भाग्य को यही मंजूर था। यह तो रही बात रा धु यानी कि राजनीती धुरंधर की।

हमारे मोदीजी परम पूज्य तो हैं वे परम प्रेरणा भी हैं। किसी भी मंत्री का भाषण सुनो। सभी के भाषण कुछ इस तरह शुरू होते हैं। आदरणीय गुजरात के लोकप्रिय मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रेरणा और मार्गदर्शन से यह काम हो रहा है। कई बार लगता है कि बेकार मे मंत्री रख रखे हैं। खैर ये तो मोदीजी की बात है , हम कौन होतें हैं इस मामले मे पड़ने वाले। पर इसमे कोई शक है क्या कि वो प प्रे , परम प्रेरणा हैं।

आप सभी ने १०१, १०८ , १००८ की महिमा तो सुनी होगी। मोदीजी ने २०६३ को सार्थक बना दिया है। तभी तो गुजरात भा ज पा ने उन्हें २०६३ कमल के फूलों की माला पहराई , लकड़ी के व्यापारियों ने २०६३ गुलाब की माला पहराई । शायद कुछ दिनों बाद लोग २०६३ मणकों की माला का जाप कर मोदीजी को सफलता और संकटमोचन के देवता के रुप मे पूजें ।

तो बोलो रा धु प प्रे २०६३ मोदीजी की जय ।

Friday, June 8, 2007

एक शाम के अखबार का पचासवां साल

किसी के भी जीवन मे पचास वर्षों का सफ़र बहुत मायने रखता है। अखबार की दुनिया मे तो यह और भी महत्वपूर्ण है। और अगर अख़बार शाम का अख़बार हो तो यह एक एतिहासिक घटना है। और यह इतिहास रचा है गुजरात के अखबार नोबत ने। इस वर्ष जामनगर शहर से निकलने वाला यह अख़बार पचासवें साल मे आ गया।

सौराष्ट्र क्षेत्र के अन्य कई जिलो की तरह, जामनगर में भी कोई सुबह प्रकाशित होने वाला अखबार नही है। पर यहाँ पूरे सात अखबार हैं जो दोपहर में निकलते है। नोबत जामनगर का ही नही पर गुजरात में फिलहाल प्रकाशित होने वाला सबसे पुराना दोपहर का अखबार है। आज जब दुनियाभर में दोपहर के अखबार सुबह के अखबारो की अपेक्षा कम गम्भीर और ज्यादा मसालेदार माने जाते हैं तब नोबत की गिनती एक प्रतिष्ठित अखबार के रुप मे होना अखबार का स्तर बताता है।

पचास वर्ष पूर्व रतिलाल माधवानी ने यह अखबार राजकोट शहर में एक पत्रिका के रुप में शुरू किया थान जो जामनगर में एक संध्या दैनिक बन कर उभरा और आज रतिलाल्जी के पुत्र दीपक माधवानी इसे संपादित कर रहे हैं.

यह एक ऐसा अखबार है जिसके पास ए बी सी प्रमाणपत्र है। आज कई बडे अखबारों के पास भी यह प्रमाणपत्र नही है। यह सब यह बतलाता है इसके पचास साल की कहानी। और शायद यही एक कारण था कि इस गुरुवार को अपने मुख्यमंत्री नरेन्द्रभाई ना केवल इसके स्वर्ण जयंती समारोह मे आये पर काफी देर रुके भी। आदतन उन्होने यहाँ भी मीडिया धुलाई कार्यक्रम बरकरार रखा।
वो बोले कि आज सौराष्ट्र बंद के समाचार अलग अलग अखबारों मे अलग अलग छापे हैं। एक कह रह है कि यह ग्रेट शो है तो दुसरा कह रह है कि ये फ्लॉप शो है। अब बेचारा पाठक क्या सोचे ? अब अपन मोदीजी को क्यां बतायें कि कितने लोग एक अखबार भी इतनी गम्भीरता से पढ़ते है, दो की तो बात छोडो । खैर मोदीजी तो मोदीजी हैं। जब से मुख्यमंत्री बने हैं मीडिया धुलाई उनकी रणनीति है।

बात चल रही थी नोबत के स्वर्ण जयंती कार्यक्रम की। जामनगर को गुजरात में हलार प्रदेश के रुप में जान जाता है। और हलार के हीर कार्यक्रम के द्वारा नोबत ने ३९ उन जामनगर वालों का सम्मान किया जिन्होनो इस शहर को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलवाई है। यहाँ के राजसी परिवार के जाम साहेब ऑफ़ जामनगर शत्रुशाल्यासिंघजी , गुजरे ज़माने के मशहूर क्रिकेटर सलीम दुर्रानी से ले आज के नए जामनगर के शिल्पकार रिलायंस के परिमल नाथवानी और एस्सार के सुखदेवसिंह सभी का सम्मान। यह कार्यक्रम एक तरह की जामनगर की डायरेक्ट्री बन रहा। अतीत से आज तक जामनगर एक मंच पर उभर आया.
शाम तो सौराष्ट्र के सुन्दर स्वरूप को लेकर आयी थी । यह थी मनहर उदास की एक ग़ज़ल की शाम। मनहर वो गायक है जिसने गुजरती ग़ज़ल को एक पहचान दीं है। और इधर नोबत ने दोपहर के अखबारों को एक नै पहचान दीं है.

Wednesday, June 6, 2007

मोदीजी का वायदों का व्यापार

अपने मोदीजी की वाक छटा का क्या कहना। मुख्यमंत्रीजी जब बोलने लगते है तो कथावाचक की जुबान की तरह साक्षात सरस्वती उनकी जुबान पर बैठ जाती है । श्रोता कैसा भी हो । मंत्रमुग्ध हो ही जाता है । यह बात अलग है कि बाद में ही उसे मालूम पड़ता है कि मोदीजी हकीकत मे क्या बोले ? ये है अपने मोदीजी का उनका अपना अंदाज ।
इस साल अपने गुजरात में चुनाव हैं । हर कोई मोदीजी से कुछ ना कुछ वसूलने के चक्कर में लगा हुआ है।
सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों ने यूनियन बना डाली। मांगे रख दीं । हड़ताल की नोटिस दे डाली। इधर व्यापारी भी मोर्चे निकाल रहे हैं। चुंगी की पुंगी बजा डालो, पिछले चुनाव के वादे पूरे करो। एक तरफ पटेल नाराज हैं तो दूसरी तरफ कोली समाज ने मोर्चा खोल डाला है।
पर अपने मोदीजी तो मोदीजी हैं। सरकारी कर्मचारियों को कहा जाओ तुम्हारी सारी मांगे मंजूर। अब कोई हड़ताल वदताल नही। समझे। उनके प्रेमी कर्मचारी नेताओं ने उन्हें फूल हार भी पहरा दिए। पर अपने कर्मचारियों कि एक समस्या है। सब मांगे अगले साल तक मे पूरी करने का वादा है मोदीजी का। चुनाव इस साल हैं। अगला साल किसने देखा है१ मालूम नही किसकी सरकार होगी राम जाने।
चुंगी हटाने का वादा पिछले चुनाव मे किया था तो अगले चुनाव से पहले हटा देंगे, अपने बात बात पर जोक मारने वाले वित्त मंत्री वजूभाई वाला बोले। किसीने भी उन्हें गम्भीरता से नही लिया और व्यापारियों ने आंदोलन जारी रखा। अगले दिन अपने मोदीजी ने कैबिनेट मीटिंग में चुंगी हटाने की घोषणा कर डाली। कहा की अब चुंगी ख़त्म। लाभ पांचम से सात शहरों मे कोई चुंगी नही ।
यह लाभ पांचम आती है १५ नवेम्बर को । लगभग छः महिनो के बाद। उसी महिने में चुनाव होंगे अगर सभ कुछ ठीक ठाक चला । फिर तो यह कैसे होगा। शायद पहले से ही पटकथा लिख डाली है। भाईयों और बहनो हमने वादा किया था कि हम लाभ पांचम से चुंगी हटा देंगे। हम हटा देते। पर चुनाव आ गए हैं। पर हम वादा करते हैं कि सत्ता पर आते ही हम इस बार चुंगी जरूर हटा देंगे।
देखा अपने मोदीजी की वाक छटा का कमाल !

Tuesday, June 5, 2007

बस नरेंदर भाई ही भाजपाई

अपने नरेंदर भाई तो नरेंदर भाई हैं। उनकी टक्कर में कौन आ सकता है। देखो खेलते खेलते गुजरात के इतिहास में आंकडो में खुद का नाम दर्ज करा दिया। हेई कोई माइ का लाल जव इतने दिनों तक मुख्यमंत्री का कांटो का ताज पहन पाया है? अपने नरेंदर भाई ने पहरा है , वह भी खुद के लिए नही। गुजरात की पांच करोड़ जनता के लिए । भाई उनके आगे पीछे तो कोई है नही। सारी दुनिया उनकी और वो सारी दुनिया के।

इसीलिये तो वो जव चाहे वो करे । भैये वो तो कानून हैं। ये हम नही कहते उनके चमचे कहते हैं। अब देखो उनके एक खास अधिकारी का क्या कहना है। इन सज्जन का कहना है की अपने नरेंदर भैया पहले भगवा मुख्यमंत्री हैं जव कुर्सी पर इतने टिके हैं। सबसे ज्यादा चिपके रहने का रेकॉर्ड बनाया है अपने नरेंदर भाई ने। ये सब तो सही पर अपने और भगवा मुख्यमंत्रियों का क्या?

अपने प्वाइंट ऑफ़ आर्डर वाले सुरेशभाई का क्या। भले वो आर एस एस की चड्डी वाले ना हों , भाजपाई तो थे। आज भी अपने पत्रकार भाई लोग उन्हें प्वाइंट आफ आर्डर उठाने के लिए याद करते हैं। कुछ भी हो ये भी एक खासियत तो थी।केसुभाई का क्या? भले ही वो वक्त पर पलती मार जाते हैं, पर वो हैं तो भाजपाई। अरे केसुभाई हैं। यह भारत है। मेरा देश है। कृष्ण का देश है। यहाँ हर विचार, हर काम का दिव्य आधार है। वह फिर झूंठ बोलना हो या फिर रण छोड़ भाग जना हो । कुछ भी हो । भाजपाई तो थे ही।

पर इस खास बन्दे ने तो इन्हें ग़ैर कांग्रेसी करार कर दिया। अब भाजपाई बचा कौन? बचेगा कौन? अपने नरेंदर भाई और कौन११ अरे भाई यहाँ अपने नरेंदर भाई का ही राज चलता है। किसीकी मजाल है की प्रेस वालों से बात करे। पूंछो अपने सनसनी सम्राट अशोक भट्ट से। बात बात पर प्रेस कांफ्रेंस बुलाने वाले अपने भट्ट जीं आजकल पत्रकारों के आने के वक्त अपने केबिन में मीटिंग शीटिंग का चक्कर शुरू कर देतें हैं बहार लाल बत्ती लगा कर। आखिरकार स्वास्थ्य मंत्री जीं को उनके राजनीतिक स्वास्थ्य की चिन्ता पहले करनी होगी। फेंक दिया था कानून विभाग में । बड़ी मुश्किल से वापिस अच्छा विभाग मिला है।

तो भैये मानते हो या नही किबस एक ही भाजपाई मुख्यमंत्री हुआ है गुजरात में। वो है पांच करोड़ गुजरातियों का एक मात्र नरेंदर भाई । विधान सभा चुनाव तक तो यही सच है , आगे की राम जाने ! ! !

पांच करोड़ का चुनावी चक्कर

कुछ नम्बर हिट हो जाते हैं सही समझे , लकी नम्बर । हमारे नरेंदर भाई के लिए पांच करोड़ शायद ऐसा ही लकी नम्बर है । तभी तो जहाँ जाते हैं पांच करोड़ की बात करतें हैं। उनका सब कुछ पांच करोड़ के लिए ही हैं। वे सब काम पांच करोड़ जनता के लिए करते हैं।

अपने कांग्रेसी भाईयों ने भी करोड़ों की बात करनी शुरू कर दीं है। हर मीटिंग मे वो भी अब पांच करोड़ की बात करते हैं । नरेंदर भाई पांच करोड़ जनता बोलते हैं तो अपने कांग्रेसी नेता कहते हैं कि नरेंदर भाई पांच करोड़ जनता के नहीं पर पांच करोड़ पतियों के हैं। अब तो हर सभा में कांग्रेसी नरेंदर भाई के पांच करोड़पतियों की ही बात करतें हैं।

कांग्रेसी कहते हैं कि भाई नरेंदर पांच करोड़पतियों को प्लेन मे बैठा घूमते रहते हैं। अपने खजुराहो वाले शंकरसिंह वाघेला यह कहते नही थकते की अरे करोड़पतियों तुम्हारी खैर नही। अब हमारी सत्ता आने वाली हैं । इतने भी केसरी मत बनो कि हमारे पास आना मुश्किल हो जाये।

यह बात अलग हैं कि जिन करोड़पतियों की बात वाघेला करते हैं वो वाघेला की प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों को खाना परोसते नजर आतें हैं ! एक दिन हम वाघेला जीं से पूछ बैठे , भैये ये पांच करोड़पति हैं कौन। आप बार बार पांच करोड़पति बोलते हैं पर नाम नही बतलाते हैं । वो तपाक से बोले सभी जानते हैं । हमने जब बार बार पूछा, तो बोले अरे ये सब छोडो और बताओ की क्या चल रहा है। एक करोड़पति मिल गए। हमने पूछा कि ये करोड़पति का क्या चक्कर है। बोले, पूछो वाघेलाजी से । हमने कहा कि वो तो कुछ बोलते ही नही। तब फिर क्यों चक्कर में पड़ते हो जिस दिन वाघेला जीं नाम बता दें , हम से मिल लेना । साफ था की वाघेलाजी नाम नही बताएँगे । बोलेंगे जरूर।

गुजरात में यह चुनाव का साल हैं और मोदीजी और वाघेलाजी दोनो को चुनाव लड़ना है और दोनो को ही वोट और नोट दोनो ही चाहिऐ । पांच करोड़ जनता के वोट और पांच करोड्पतियो के नोट।

ये है पांच करोड़ का चुनावी चक्कर।

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