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Wednesday, September 20, 2017

बापू बन गए CM

बापू। हालांकि पूरी दुनिया में महात्मा गांधी बापू के नाम से प्रख्यात हुएः आज अपने गुजरात में बापू यानि कि अपने शंकरसिंह वाघेला। वैसे तो गांव गांव में बापू मिल जाएंगे, पर राज्य स्तर पर तो बापू शब्द के साथ एक ही छवि झलकती है।
पिछले काफी समय से गुजरात में चर्चा चल रही है कि बापू मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं। हालांकि बापू हर बार यह कहते हैं कि वे इस रेस में नहीं हैं। आजतक किसी ने यह कहा है क्या? तो फिर बापू क्यों कहेंगे? यह बात अलग है कि वे अपने स्टाईल में यह जाहिर कर देंगे कि केवल वही है इस कुर्सी के लायक।

जुलाई महिने में जब अपने बापू ने खुद को कांग्रेस मुक्त किया तब भी यही कहा कि लोग झूठी अफवाह फैलाते हैं कि मैं मुख्यमंत्री की दौड़ में हूं। बोले मैं तो सरकार और प्रशासन में से खो गए आम आदमी के लिए हूं। उसी कार्यक्रम में एक छोटा अखबार बांटा गया जिसमें उस समय की बातें थी जब अपने बापू भाजपा में खजुराहो कांड कर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आम आदमी की सेवा में असीन हो गए थे।
यह तो राजनीति का सनातन सत्य है। अपने आप आप कह दिल्ली में मुख्यमंत्री बनने वाले अरविंद केजरीवाल हों या फिर देश के लिए सब कुछ कुर्बान करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी। सत्ता से पहले और सत्ता पर आने के द्वैतवाद के मानवीय स्वभाव के अलावा क्य कहें? खैर बात अपन बापू की कर रहे थे। अब बापू बन गए मुख्यमंत्री।
बापू का कहना है कि कुछ युवक जिनका राजनीति से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है उन्होंने गुजरात के कुछ नेताओं के बारे में लोगों का सर्वे किया था। इस सर्वे में पाया गया कि बापू सबसे लोकप्रिय नेता हैं और सबका मानना है कि वे ही गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के लिए योग्य है।
उन्होंने यह तो बताया कि यह सर्वे जनविकल्प नामक हाल ही में पैदा हुई संस्था ने करवाया है। अभी तक सड़कों पर छाये पोस्टरों से यह संस्था आज बापू की कांफ्रेंस के द्वारा मीडिया में प्रकट हुई। हालांकि इसमें कौन क्या है इसका कोई अता पता अभी भी नहीं है। जनविकल्प के बारे में बापू ने कुछ नहीं बताया पर अपने राजनीति और मीडिया के मित्रों का कहना है कि यह संस्था बापू का ही दिमागी बालक (ब्रेन चाइल्ड) है।
कुछ पत्रकार जानना चाहते थे कि वे कौन लोग थे जो सर्वे में बापू के साथ कुर्सी की दौड़ में खड़े थे? किस-किस का क्या रेटिंग था? बापू ने ये प्रश्न सुने ही नहीं। बापू ने एक बार फिर दावा किया कि वे स्वयं चुनाव नहीं लड़ेंगे। हाँ, जनविकल्प के द्वारा सम्भव हुआ तो 182 को जरूर चुनाव लड़वा देंगे।
आजकल बापू बार-बार यह कहते हैं कि मैं पचास साल सै राजनीति में हूं। बार बार यह कहते हैं कि मैं भाजपा और कांग्रेस से मुक्त हुआ हूं राजनीति से नहीं। वे सगर्व स्वीकार करते हैं कि वे आरएसएस में काफी समय रहे हैं।
जुलाई में जब उन्होंने कांग्रेस छोड़ी नहीं थी तब एक बार कहा था कि भाजपा वालों की बात का भरोसा नहीं। ऐसे में उन्होंने आरएसएस के संदर्भ में कही एक उक्ति के अनुसार जब उन्हें कथनी और करनी में भेद रखना होता है तो उसके लिए उनकी सीक्रेट भाषा में यह कहा जाता है। हमें वह उक्ति याद नहीं। पर इससे आप हमे यह कहने से रोक नहीं सकते कि बापू मुख्यमंत्री की दौड़ में नहीं है।
आज बच्चा भी जानता है कि मुख्यमंत्री बनने के लिए पहले विधायक बनना जरूरी नहीं है। आप पैराशूट से मुख्यमंत्री कार्यालय में लैंड करिये फिर छह महिने में एमएलए बन सामने के द्वार से आ मुख्यमंत्री पद का रीटेक करिए।
अब मोदीजी को ही लीजिए। पहले मुख्यमंत्री और फिर राजकोट-2 के द्वार से वोट की राजनीति मे एन्ट्री ली। हाल ही में अपने पारीकर भाई रक्षा मंत्रालय से सीधे गोआ के मुख्यमंत्री कार्यालय में आए।
अपने बापू को एक दुख है कि जब राजपा बना वे मुख्यमंत्री बने तो सहयोगी कांग्रेसियों की वजह से उनहोंने राज खोया नहीं तो भाजपा की री एन्ट्री नहीं होती और वे मुख्यमत्री बने रहते। और अपने मोदीजी किसी संगठन कार्य में जुड़े होते।
खैर दोस्तो कुछ भी हो अपने बापू एक बार फिर मुख्यमंत्री बन गए उनके जनविकल्प के सर्वे में!!!

मीडिया से बातचीत में बापू ने साफ साफ कह दिया वो किसी से वोट मांगनेवाले नहीं है। अगर लोग उनकी आज की खराब हालत से मुक्त होना चाहते हैं, तो वे जनविकल्प को वोट दें। बापू तो बापू है, कुछ भी कह सकते हैं, कुछ भी कर सकते हैं।

Wednesday, June 17, 2015

कूल मंत्री नितिन पटेल

आपको लग रहा होगा कि गुजरात की आज की ब्रेकिंग न्यूज कांग्रेसी नेता शंकरसिंह वाघेला के निवास पर मोदी सरकार की सीबीआई के छापे है। पर जब यह समाचार बुद्धु बक्से पर छाए हुए थे तब बुधवार को कैबीनेट की ब्रीफिंग कवर करने वाले पत्रकार राज्य सरकार के एक प्रवक्ता मंत्री नितिन पटेल में एक स्माइलिंग बुद्धा देख रहे थे।
नितिन पटेल
मीडिया से दूर रहने वाले, जरुरी प्रश्नों को भी टालने वाले और विधान सभा में बात बात पर भड़क जाने वाले नितिन भाई का हंस हंस कर बात करने वाला यह स्वरूप सभी के लिए ब्रेकिंग न्यूज से कम नहीं था।
कुछ को तो उनमें राहुल गांधी के विपसन्ना ध्यान के बाद परिवर्तन जैसी झलक दिखलाई दी। पर पिछले कई महिनों से गांधीनगर के सत्ता के गलियारों में हमेशा दिखलाई देने वाले अपने नितिन भाई कहीं ऐसे किसी ध्यान या योग कार्यक्रम में जाकर आए हो ऐसे समाचार तो क्या अफवाह भी किसी ने नहीं सुनी थी।
कारण शारण जाने दो। हकीकत यह है कि सरकार बदले-बदले नजर ही नहीं आते थे पर बदले हुए थे! पत्रकारों का टोला जब उनके चैम्बर में मधुमक्खी के छत्ते की तरह बैठ गया तो बात निकली उनके पुराने साथी शंकरसिंह वाघेला जिन्होंने उनका सामाजिक जीवन एक आरएसएस प्रचारक के रूप में शुरू किया था।
देश में भाजपा के कई दिग्गज नेता हैं। उनके गुरु शिरोमणि हैं अपने नरेन्द्र मोदीजी। वाघेलाजी आरएसएस और भाजपा की नींव की ईंट से ले उसकी गुजरात शाखा की ईंट से ईंट बजा भाजपा के दो टुकड़े करने वाले भाजपा के एकमात्र नेता हैं शंकरसिंहजी।
आजकल एकमात्र, सबसे पहले जैसे शब्दों के बिना कोई स्टोरी ही नहीं बनती। हमारे पत्रकार मित्र होमवर्क कर संज्ञा ढूंढने की जगह सीधे विशेषणों का ही उपयोग कर डालते हैं।
ना ना करते हुए भी हल्के मुस्कराते और नजरे घुमाते अपने नितिन भाई वाघेलाजी के बारे मे बात बढ़ाते रहे। मालूम नहीं है कह कर भी उन्होंने बता दिया कि वाघेलाजी के घर सीबीआई की रेड पड़ी है, आदि आदि।
साथ ही उन्होंन पत्रकारों को अनिवार्य मतदान प्रक्रिया में प्रगति के बारे में हर सवाल का जवाब दिया भले ही वह पहले पूछा जा चुका हो या फिर किसी को भी गुस्सा दिला सके। एक पत्रकार ने पूछा अनिवार्य मतदान कानून क्यों लाया गया? दूसरे ने प्रश्न दागा कि क्या यह स्वतंत्रता के मूलभूत अधिकार का उल्लंघन नहीं है? तो तीसरे का सवाल था कि इसे लागू करने के लिए कितने स्टाफ की जरूरत होगी।
यदि अपने पहले वाले नितिनभाई होते तो कभी के थैंक्यू कह अपनी बिरादरी को चैम्बर का दरवाजा दिखला देते। वो यह भी कहते कि जब कानून बना था तभी उसका उद्देश्य बताया गया था। इसमें कुछ प्रश्न पहले भी पूछे जा चुके थे।
पर अपने मंत्रीजी तो कूल मंत्री बन गए थे। अगर योग की भाषा में बात करें तो वे प्रसन्न मुद्रा में प्रसन्नवतार बन चुके थे। सच कहें तो हमने किसी योग की पुस्तक में न तो प्रसन्न मुद्रा के बारे में पढ़ा है और न ही प्रसन्नवतार के बारे में। बीच बीच में वाघेला जी का जिक्र भी उसी सहजता से कर रहे थे।
और उन्होंने मतदान कानून की कॉपी मंगा पत्रकारों के सवाल के जवाब दिए और अपने भाई लगे प्रश्न पर प्रश्न पूछने पर।
यह घटना इतनी विलक्षण थी कि ब्रीफिंग के खत्म होने के बाद काफी समय पत्रकारों की सतही चर्चा का मुद्दा कूल मंत्री की प्रसन्न मुद्रा था। यह बात अलग है कि पेज थ्री आईटम की तरह कोई इस गहराई तक नहीं पहुंच पाया कि इसका राज क्या है!!

अगर हमें मालूम पड़ा तो हम जरूर इस कॉलम में लिखेंगे।

Thursday, February 21, 2013



विधान सभा की भगवा छटा

गुजरात विधान सभा का यह सत्र कई अर्थों में नया है। पिछले सात टर्म से भी अधिक समय से गुजरात विधान सभा के सदस्य और वित्त मंत्री रह चुके वजुभाई वाला अब विधान सभा अध्यक्ष हैं।

बार बार विधान सभा में तरह तरह के कोमेंट के लिये मशहूर अपने नितिनभाई अब वित्त मंत्री जैसी भारी पोस्ट पर बैठ सरकार को बचाने के फायर फाईटिंग ऑपरेशन में इस तरह फंसे दिखाई देते हैं कि कोमेंट वोमेंट कम ही कर्ते दिखलाई देते हैं।

खैर मुद्दा तो भगवा छटा का है। प्रतिपक्ष के नेता शंकरसिंह वाघेला  किसी जमाने के भाजपा के कद्दावर नेता हैं। गुजरात में भाजपा की नींव रखने वाले शंकरसिंह वाघेला  ने गुजरात में भाजपा को तोड़ यह भी बता दिया कि भाजपा अटूट नही हैं। वह भी और दलों की तरह ही है। हां पर भाजपा में शंकरसिंह वाघेला  की टक्कर का कोई और नेता नही है। पूरे देश में।

दो बार मुख्य मंत्री रह चुके अपने केशूभाई पटेल विरोध का दूसरा छोर हैं। दो सदस्यों वाली गुजरात परिवर्तन पार्टी के नेता हैं। पूरी जिंदगी आर एस एस से जुड़े रहे अपने केशूभाई पटेल ने मुख्य मंत्री नरेन्द्र मोदी को कोसते हुए भाजपा छोड़ दी और चुनाव से कुछ महीने पहले गुजरात परिवर्तन पार्टी बना ली।

पर केशुबापा के नाम से मशहूर अपने केशूभाई पटेल की किस्सा तो पहले प्यार के टूटने वाले आशिक जैसा है। दिल तो उनका अभी भी भगवा ही है। इसलिये चुनाव के दौरान वे यह कहते थे कि असली भाजपा तो उनकी है।

आप विधान सभा अध्यक्ष वजुभाई वाला की हालत की कल्पना कर सकते हैं। सदन मे वे जहां भी नज़र करते हैं , बुलन्दी पर भगवा ही दिखलाई देता है। फिर चाहे वो उनके अपने भाजपा वाले मुख्य मंत्री नरेन्द्र मोदी हों या फिर भूपू भाजपाई शंकरसिंह वाघेला  और केशूभाई पटेल हों।

तीनों की विषेशता यह है कि , तीनों एक ही स्कूल की प्रोडेक्ट हैं। विचार से ले भाषण देने की कला तक।

इसलिये आज जब शंकरसिंह वाघेला  ने अपना धांसू भाषण दिया तो भाजपाईयों के पास उसका कोई तोड़ ही नही था। क्योंकि छटा तो भगवा थी!
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