कल रात केशुभाई ने दूसरा गोला दागा। दो दिन पहले उनके विचारो मे लिपटा हुआ सरदार पटेल उत्कर्श समिति का एक विग्यापन छपा था। कल तो वे खुद बोले। उन्होने मोदी का नाम नही लिया, पर जो भी बोले,जितना भी बोले उससे साफ़ था कि उनकी जंग मात्र मोदी के शासन के खिलाफ़ हैं। उनका इंटरव्यु एक चैनल पर प्रसारित हुआ।
केशुभाई गुजरात मे भाजपा को शून्य से शुरू करने वाले नेताऒ मे से एक है। दो बार मुख्य मंत्री रह चुके केशुभाई पटेल और नरेन्द्र मोदी कट्टर राजनीतिक दुश्मन हैं ।
इनका कहना था कि गुजरात मे डर का माहौल है, वहां लोकतंत्र नहीं तानाशाही है। उनकी बात शायद गुजरात के बाहर के लोगों को समझ मे ना आये। गुजरात मे भी आम आदमी यह समझ नही पा रहा है। यदि हम विधान सभा की कार्यवाही हे देखे तो मालूम पडेगा कि आप सरकार के या मोदी के विरुद्ध मुद्दा छेडिये और शासक पक्ष का हंगामा शुरू।बहुमति के जोर पर जल्द ही विरोध करने वाले को सदन के बाहर।
किताबों मे लोकतंत्र पढ्ने वाले इस व्यवहारिक लोकतंत्र को नही समझ पायेंगे। पर यह गुजरात की हकीकत है। साफ़ है कि भाजपा का कोई सदस्य तो सदन मे सरकार की बुराई नही कर पायेगा। सदन के बाहर मोदीजी बाहर वालों की तो छोडो, खुद की पार्टी वालों की भी नही सुनते।
उन्होने निवेश का मुद्दा भी छेडा।साफ़ है की सारा निवेश कुछ चुने हुए उध्योगपतियों से ही आ रहा है। उसका फ़ल भी उन्ही को ही मिल रहा है। आम आदमी का क्या?
पर केशुभाई ने ये सभी बातें गोल गोल कहीं । ना तो मोदी का नाम लिया और ना ही उनका कोई विकल्प सुझाया।
औरों की बात छोडॊ, केशुभाई आप खुद नरेन्द्र मोदी से कितने डरे हुए हैं कि वो कहीं आप को पार्टी से बाहर नही निकलवा दे!!!!
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Tuesday, December 4, 2007
गुजरात भवन में रहने के टिप्स
दिल्ली में चाणक्यपुरी मे जहां एक और सभी देशों के दूतावास हैं वहीं सभी राज्यों के भवन भी हैं । उसमे अपने गुजरात का भवन भी है। चुनाव टिकट रिपोर्टिंग के चक्कर मे एक पखवाडे मे तीन बार वहां रुकना हुआ। हम यहां अपने अनुभव के निचोड को पाठको की सुविधा के लिये पेश कर रहे हैं।
सर्वप्रथम तो जहां तक संम्भव हो यहां रुकना टाले, सिवाय की आप गुजरात सरकार के आला अफ़सर है या फ़िर राजनीतिक तोप हैं। या फ़िर हमारी तरह मजबूरी मे रुक रहे हैं।
यह समझने के लिये यह बता दें कि विपक्ष के नेता अर्जुन मोढवाडिया को भी कमरा मिलने में दिक्कत होती है। दूसरा तरीका यह है कि काउंटर पर अगर आप मा-बहन कर सकते हैं तो आपके कमरा पाने के अवसर बढ जाते हैं। एक दिन सुबह सुबह लीम्बडी के विधायक भवान भरवाड के बुकिंग कराने के बावजूद उन्हे कमरा नही मिला तो उन्होने मोदी सरकार का मां बहन चालीसा गाना शुरू किया । और स्टाफ़ को तुरन्त ही उनके लिये कमरा दिखलाई दे गया। उसके बाद हमने यह नुस्खा सफ़लतापूर्वक कईयों को अपनाते हुए देखा।
यदि आप तोप नही हैं तो मेहरबानी कर आप अपना तौलिया और साबुन जरूर ले जायें । यहा यह आसानी से नही मिलता। ऎसा भी हो सकता है कि आपके काफ़ी रिकझिक करने पर आपको फ़टा हुआ तौलिया मिले। वैसे तो चद्दर वगैरह भी कब बदली जाती है, इसके नियम हम अभी तक नही समझ पाये हैं। यह अनुभव आधारित सलाह है।
भले ही आप को गुजराती संस्कृति और गुजरात से कितना भी लगाव हो, यहां गुजरात ढूंढने की कोई कोशिश न करें। अन्यथा यह खुद को दुखी करने का एक प्रयास ही होगा।यहां सुबह नाश्ते मे गुजराती फ़ाफ़डा, खमण मिलना बंद हो गया है। भोजन मे जरूर गुजराती छटा है, पर इसमे भी छाश, कचुमर जैसी वस्तुएं लुप्त हो गई है। सारा स्टाफ़ बाहर का है और वह दो तीन गुजराती शब्द ही जानता है। केम छो, आवजो और रूम नथी!!!
हमने देखा कि अधिकतर लोग बाहर खाना पसंद करते हैं। ये वो लोग हैं जिन्हे गुजरात भवन मे रहने का पाला बार बार पडता है। मांसाहारी खाने के शौकीन बगल के जम्मू कश्मीर भवन मे जाते है और शाकाहारी लोगों के लिये निकट का मध्यप्रदेश भवन प्रिय स्थल है। आप कोई और स्थल भी चुन सकते हैं।
पिछले काफ़ी समय से यहां रिक्त स्थानो की भरती ना होने के कारण यहां का स्टाफ़ हमेशा काम के बोझ के तले ही दबा रहता है। हालांकि यह आथित्य सत्कार क्षेत्र का अंग है, यहां के स्टाफ़ को कोई भी नया अतिथी एक बोझ लगता है। अपनी समस्याऒं का अधिकारियों द्वारा हल ना पा सकने के कारण स्टाफ़ का शिकार आने वाले मेहमान होते हैं । क्योकि तोप लोगो के सामने कुछ नही चलती इसलिये स्टाफ़ की भडा़स एक या दूसरे तरीके से आम अतिथी पर ही निकलती है। आप इस भडा़स को अपने तरीके से हेंडल कर सकते हैं! आप या तो खुद का भेजा गरम कर सकते हैं या फ़िर सामने वाले की जेब!!!
अगर आप रूम मे टिक ही गयें हैं तो आप पंखों पर जमी गंद की काली पर्त से ना घबरायें। यह गंद इतनी जोरदार चिपक गई है कि आप पर इसका एक कण भी नही गिरेगा। हमने इस गर्द का वजन ढूंढ्ने का कोई सार्थक प्रयास नही किया है इसलिये हम यह बताने की स्थिति मे नही हैं कि ये पंखे कब तक इस गर्द का बोझ सहन कर पायेंगे।
नहाते समय इस बात का ध्यान रखे कि पानी जा सकता है, या फ़िर गीजर काम न करता हो। पर अभी ये घटनायें जल्दी जल्दी नही होती हैं । चाय कॉफ़ी आने पर यदि केतली का ढ्क्कन नदारद हो तो वेटर को कोसने की जगह चाय कॉफ़ी जल्दी से गुटकने पर शक्ति केंद्रित करें । आपके स्वास्थय और जेब के लिये यही हितकर होगा। रूम मे टोस्ट खाने के लिये सामान्य ओर्डर देने से थोडे ज्यादह प्रयत्न करने के लिये तैय्यार रहें। आपको तैय्यार जवाब मिलेगा, कि टोस्टर बिगडा हुआ है। ब्रेड बटर से काम चला लो।
यदि आप यह मानते हैं कि काउंटर पर चाबी छोडने से आपका कमरा साफ़ मिलेगा, तो आप अपनी धारणाऒ के टूटने के दुख को सहन करने के लिये तैय्यार रहें। मित्रो ये टिप्स पीछे वाली विंग मे अधिक लागू होते है।
यह हाल पिछले कुछ वर्षो मे ही हुआ है। एक जमाना था कि गुजरात भवन नम्बर वन था। यहां बाहर के लोग भी आ कर उनके कार्यक्रम किया करते थे।
मजेदार बात तो यह है कि अपने मुख्यमंत्री नरेन्द्रभाई भी जब दिल्ली आते हैं तो यही रुकते है। पर वो तो CEO ठहरे गुजरात के। दिल्ली मे विभिन्न राज्यों के भवन उन राज्यो के परिचायक हैं । और यह है परिचय हमारे नरेन्द्र्भाई के नम्बर वन गुजरात के गुजरातभवन का!!!
सर्वप्रथम तो जहां तक संम्भव हो यहां रुकना टाले, सिवाय की आप गुजरात सरकार के आला अफ़सर है या फ़िर राजनीतिक तोप हैं। या फ़िर हमारी तरह मजबूरी मे रुक रहे हैं।
यह समझने के लिये यह बता दें कि विपक्ष के नेता अर्जुन मोढवाडिया को भी कमरा मिलने में दिक्कत होती है। दूसरा तरीका यह है कि काउंटर पर अगर आप मा-बहन कर सकते हैं तो आपके कमरा पाने के अवसर बढ जाते हैं। एक दिन सुबह सुबह लीम्बडी के विधायक भवान भरवाड के बुकिंग कराने के बावजूद उन्हे कमरा नही मिला तो उन्होने मोदी सरकार का मां बहन चालीसा गाना शुरू किया । और स्टाफ़ को तुरन्त ही उनके लिये कमरा दिखलाई दे गया। उसके बाद हमने यह नुस्खा सफ़लतापूर्वक कईयों को अपनाते हुए देखा।
यदि आप तोप नही हैं तो मेहरबानी कर आप अपना तौलिया और साबुन जरूर ले जायें । यहा यह आसानी से नही मिलता। ऎसा भी हो सकता है कि आपके काफ़ी रिकझिक करने पर आपको फ़टा हुआ तौलिया मिले। वैसे तो चद्दर वगैरह भी कब बदली जाती है, इसके नियम हम अभी तक नही समझ पाये हैं। यह अनुभव आधारित सलाह है।
भले ही आप को गुजराती संस्कृति और गुजरात से कितना भी लगाव हो, यहां गुजरात ढूंढने की कोई कोशिश न करें। अन्यथा यह खुद को दुखी करने का एक प्रयास ही होगा।यहां सुबह नाश्ते मे गुजराती फ़ाफ़डा, खमण मिलना बंद हो गया है। भोजन मे जरूर गुजराती छटा है, पर इसमे भी छाश, कचुमर जैसी वस्तुएं लुप्त हो गई है। सारा स्टाफ़ बाहर का है और वह दो तीन गुजराती शब्द ही जानता है। केम छो, आवजो और रूम नथी!!!
हमने देखा कि अधिकतर लोग बाहर खाना पसंद करते हैं। ये वो लोग हैं जिन्हे गुजरात भवन मे रहने का पाला बार बार पडता है। मांसाहारी खाने के शौकीन बगल के जम्मू कश्मीर भवन मे जाते है और शाकाहारी लोगों के लिये निकट का मध्यप्रदेश भवन प्रिय स्थल है। आप कोई और स्थल भी चुन सकते हैं।
पिछले काफ़ी समय से यहां रिक्त स्थानो की भरती ना होने के कारण यहां का स्टाफ़ हमेशा काम के बोझ के तले ही दबा रहता है। हालांकि यह आथित्य सत्कार क्षेत्र का अंग है, यहां के स्टाफ़ को कोई भी नया अतिथी एक बोझ लगता है। अपनी समस्याऒं का अधिकारियों द्वारा हल ना पा सकने के कारण स्टाफ़ का शिकार आने वाले मेहमान होते हैं । क्योकि तोप लोगो के सामने कुछ नही चलती इसलिये स्टाफ़ की भडा़स एक या दूसरे तरीके से आम अतिथी पर ही निकलती है। आप इस भडा़स को अपने तरीके से हेंडल कर सकते हैं! आप या तो खुद का भेजा गरम कर सकते हैं या फ़िर सामने वाले की जेब!!!
अगर आप रूम मे टिक ही गयें हैं तो आप पंखों पर जमी गंद की काली पर्त से ना घबरायें। यह गंद इतनी जोरदार चिपक गई है कि आप पर इसका एक कण भी नही गिरेगा। हमने इस गर्द का वजन ढूंढ्ने का कोई सार्थक प्रयास नही किया है इसलिये हम यह बताने की स्थिति मे नही हैं कि ये पंखे कब तक इस गर्द का बोझ सहन कर पायेंगे।
नहाते समय इस बात का ध्यान रखे कि पानी जा सकता है, या फ़िर गीजर काम न करता हो। पर अभी ये घटनायें जल्दी जल्दी नही होती हैं । चाय कॉफ़ी आने पर यदि केतली का ढ्क्कन नदारद हो तो वेटर को कोसने की जगह चाय कॉफ़ी जल्दी से गुटकने पर शक्ति केंद्रित करें । आपके स्वास्थय और जेब के लिये यही हितकर होगा। रूम मे टोस्ट खाने के लिये सामान्य ओर्डर देने से थोडे ज्यादह प्रयत्न करने के लिये तैय्यार रहें। आपको तैय्यार जवाब मिलेगा, कि टोस्टर बिगडा हुआ है। ब्रेड बटर से काम चला लो।
यदि आप यह मानते हैं कि काउंटर पर चाबी छोडने से आपका कमरा साफ़ मिलेगा, तो आप अपनी धारणाऒ के टूटने के दुख को सहन करने के लिये तैय्यार रहें। मित्रो ये टिप्स पीछे वाली विंग मे अधिक लागू होते है।
यह हाल पिछले कुछ वर्षो मे ही हुआ है। एक जमाना था कि गुजरात भवन नम्बर वन था। यहां बाहर के लोग भी आ कर उनके कार्यक्रम किया करते थे।
मजेदार बात तो यह है कि अपने मुख्यमंत्री नरेन्द्रभाई भी जब दिल्ली आते हैं तो यही रुकते है। पर वो तो CEO ठहरे गुजरात के। दिल्ली मे विभिन्न राज्यों के भवन उन राज्यो के परिचायक हैं । और यह है परिचय हमारे नरेन्द्र्भाई के नम्बर वन गुजरात के गुजरातभवन का!!!
Monday, December 3, 2007
कांग्रेस का सुदर्शन चक्र
कांग्रेस ने हाल ही मे उसका चुनावी घोषणापत्र जारी किया। उसे नाम दिया कांग्रेस की शपथ। आजकल राजनीतिक दलों मे यह एक नयी शैली शुरू हो गई है। भाजपा ने इस बार अभी तक उसका घोषणापत्र जारी नही किया है। शायद जारी नही भी करे। पिछली बार उसने इसे संकल्प पत्र का नाम दिया था। यह बात अलग है कि मुश्किल से १० प्रतिशत संकल्प ही पूरे हुए हैं । खैर हम बात कर रहे हैं कांग्रेस के शपथपत्र की।
देखा जाये तो इसमे कुछ नया नही है। पर, कुछ घोषणाएं तो ऎसी हैं वो मोदीराज की समस्याओं का हल हैं। आजकल गुजरात मे किसान मोदीजी की सरकार से त्रस्त हैं। उन पर बिजली चोरी के केस ही नही हो रहे, उन्हे बिजलीचोर के रूप मे विज्ञापनों मे दर्शाया जा रहा है। अब कांग्रेस का कहना है कि वह सत्ता मे आयी तो वह किसानो के सारे केस वापिस ले लेगी। इसके साथ ही छोटे किसानों के लिये राहत दर पर खाद और बिजली ! किसानों के लिये इससे ज्यादह खुशी कि बात और क्या हो सकती है।
मोदीजी के आने के बाद शिक्षकों की भर्ती ही बंद हो गई है । तीन हजार के फ़िक्स वेतन पर विद्यासहायक और शिक्षासहायकों की भरती की जाती है। कांग्रेस का कहना है कि यदि सत्ता मे आयी तो वो शिक्षकों की भरती पूरे स्केल वाले वेतन से करेगी। कौन नही चाहेगा ऎसी नौकरी।
हमारे मोदीजी ने विधवा और त्यकताओं को मिलने वाली मदद पर रोक लगा दी है। उनकी सरकार का कहना है कि इस योजना का दुरूपयोग होता है। घोटालेबाजों को ढूंढने के नाम पर किसी को भी भत्ता नही मिल रहा । ऎसे में कांग्रेस कह रही है कि सत्ता मे लाओ, भत्ता पाओ और और भी ज्यादा राशी पाओ ।
इसी प्रकार सरकारी डोक्टरों को वादा किया है कि मोदी ने जो डोक्टरों का NPA बंद किया है, उसे वो वापिस शुरू कर देंगे। साफ़ है, मोदीजनित समस्याऒं के हल के सहारे कांग्रेस सत्ता पाने की नीति पर चल रही है। कांग्रेस इसमे सफ़ल होगी या नही, यह तो चुनाव परिणाम ही बतायेंगे। पर यह साफ़ है कि इस शपथपत्र ने भाजपाईयों की नींद उडा दी है। परिणामस्वरूप भाजपा के केंद्रीय प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर ने पत्रकारों को प्रेसनोट ठोक दिया कि कांग्रेस का शपथपत्र किराये के टट्टूऒं ने बनाया है और इसमे भाजपा की योजनाऒ को ही दोहराया गया है!!!
देखा जाये तो इसमे कुछ नया नही है। पर, कुछ घोषणाएं तो ऎसी हैं वो मोदीराज की समस्याओं का हल हैं। आजकल गुजरात मे किसान मोदीजी की सरकार से त्रस्त हैं। उन पर बिजली चोरी के केस ही नही हो रहे, उन्हे बिजलीचोर के रूप मे विज्ञापनों मे दर्शाया जा रहा है। अब कांग्रेस का कहना है कि वह सत्ता मे आयी तो वह किसानो के सारे केस वापिस ले लेगी। इसके साथ ही छोटे किसानों के लिये राहत दर पर खाद और बिजली ! किसानों के लिये इससे ज्यादह खुशी कि बात और क्या हो सकती है।
मोदीजी के आने के बाद शिक्षकों की भर्ती ही बंद हो गई है । तीन हजार के फ़िक्स वेतन पर विद्यासहायक और शिक्षासहायकों की भरती की जाती है। कांग्रेस का कहना है कि यदि सत्ता मे आयी तो वो शिक्षकों की भरती पूरे स्केल वाले वेतन से करेगी। कौन नही चाहेगा ऎसी नौकरी।
हमारे मोदीजी ने विधवा और त्यकताओं को मिलने वाली मदद पर रोक लगा दी है। उनकी सरकार का कहना है कि इस योजना का दुरूपयोग होता है। घोटालेबाजों को ढूंढने के नाम पर किसी को भी भत्ता नही मिल रहा । ऎसे में कांग्रेस कह रही है कि सत्ता मे लाओ, भत्ता पाओ और और भी ज्यादा राशी पाओ ।
इसी प्रकार सरकारी डोक्टरों को वादा किया है कि मोदी ने जो डोक्टरों का NPA बंद किया है, उसे वो वापिस शुरू कर देंगे। साफ़ है, मोदीजनित समस्याऒं के हल के सहारे कांग्रेस सत्ता पाने की नीति पर चल रही है। कांग्रेस इसमे सफ़ल होगी या नही, यह तो चुनाव परिणाम ही बतायेंगे। पर यह साफ़ है कि इस शपथपत्र ने भाजपाईयों की नींद उडा दी है। परिणामस्वरूप भाजपा के केंद्रीय प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर ने पत्रकारों को प्रेसनोट ठोक दिया कि कांग्रेस का शपथपत्र किराये के टट्टूऒं ने बनाया है और इसमे भाजपा की योजनाऒ को ही दोहराया गया है!!!
एक विज्ञापन जिसने तहलका मचा दिया
अहमदाबाद के अखबारों मे आज एक आधा पन्ने का विज्ञापन छपा। तानाशाहों को गद्दी से उतार फ़ेकों। बागी भाजपाईयों की सरदार पटेल उत्कर्ष द्वारा दिये गये इस विज्ञापन की विशेषता यह है कि इसमे केशुभाई का फ़ोटो है जिसमे वो हेडलाईन की ओर इशारा करते हुए दिखाई दे रहे है । विज्ञापन मे कहा गया है कि केशुबापा की जनता को अपील- आज परिवर्तन लाने की सख्त जरूरत।
गुजरात और समाज के हित मे पूरी जिन्दगी लगा देने वाले केशुबापा बहुत दुखी हैं । उन्होने भाजपा का प्रचार करने से इंकार कर दिया है। उन्होने यह निर्णय कितने दुखी मन से लिया है यह सोचना। घर मे बैठे मत रहना। मतदान करने के लिये निकलना और परिवर्तन के लिये ही मतदान करना।
केशुभाई भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं और गुजरात के दो बार मुख्य मंत्री रह चुके हैं ।
केशुभाई बागी भाजपाईयो की अगुवाई कर रहे हैं। पिचले कुछ समय से एक व्यवस्थित रूप से कहा जा रहा है कि केशुभाई विरोध मे प्रचार नही करेंगे। यह भी कहा जा रहा है कि केशुभाई अमरीका चले जायेंगे और बागियों को अकेला छोड देंगे। इस विज्ञापन ने इन सभी अफ़वाहों को गलत सिद्ध कर दिया है। साफ़ है कि केशुभाई उनके राजनीतिक दुश्मन नरेंन्द्र मोदी को चुनावी संग्राम मे नही छोडेंगे ।
गुजरात और समाज के हित मे पूरी जिन्दगी लगा देने वाले केशुबापा बहुत दुखी हैं । उन्होने भाजपा का प्रचार करने से इंकार कर दिया है। उन्होने यह निर्णय कितने दुखी मन से लिया है यह सोचना। घर मे बैठे मत रहना। मतदान करने के लिये निकलना और परिवर्तन के लिये ही मतदान करना।
केशुभाई भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं और गुजरात के दो बार मुख्य मंत्री रह चुके हैं ।
केशुभाई बागी भाजपाईयो की अगुवाई कर रहे हैं। पिचले कुछ समय से एक व्यवस्थित रूप से कहा जा रहा है कि केशुभाई विरोध मे प्रचार नही करेंगे। यह भी कहा जा रहा है कि केशुभाई अमरीका चले जायेंगे और बागियों को अकेला छोड देंगे। इस विज्ञापन ने इन सभी अफ़वाहों को गलत सिद्ध कर दिया है। साफ़ है कि केशुभाई उनके राजनीतिक दुश्मन नरेंन्द्र मोदी को चुनावी संग्राम मे नही छोडेंगे ।
Sunday, December 2, 2007
गुलाटमार यतिन वापिस भाजपा में
गुजरात की राजनीति से ले कोर्ट कचहरी तक मे यतिन ऒझा को कौन नही जानता? काफ़ी मशहूर हैं । एक नेता या वकील के रूप मे कम,सनसनीबाज आदमी के रूप मे ज्यादा। मजेदार बात यह है कि इस सबके बावजूद वे अहमदाबाद के जनजीवन मे एक बडा नाम हैं। वो साबरमती के भाजपा के विधायक रह चुके हैं । कुछ साल पहले नाराज हो गये। तत्कालीन मुख्य मन्त्री केशुभाई पटेल को कुछ पत्र दाग, भाजपा को गालियां बक भाजपा को अलविदा कह दी।
जुड गये कांग्रेस मे। और काफ़ी समय तक गुमनामी मे खो रहे। अब जब चुनाव की बात चली तो अपने यतिन भाई का बजार वापिस गर्म हो गया। जब लगा कि कांग्रेस मे दाल नही गलेगी , उन्होने मोदीजी के आसपास घूमना शुरू कर दिया। पर अपने भाई बेवकूफ़ थोडे है। हवा फ़ैल्वा दी, कि यतिन वापिस भाजपा मे आ रहे हैं। नतीजा । अपने यतिन भाई सभी को सफ़ाई देते नजर आये कि इस बात मे दम नही है।
कुछ दिन पहले मिल गये कांग्रेस भवन मे । बोले, योगेश मै शाह्पुर से चुनाव लड रहा हू, कांग्रेस की टिकट पर। उनका वही अंदाज। आखों मे आंख डाल कर। कोई उनकी बातॊ को गलत कैसे मान सकता है। हमने भी उनके दोस्तों को फ़ोन कर कर कह दिया, भैये दो अभिनंदन यतिन को । थोडी देर बाद हमारे फ़ोन की घंटिया बजने लगी। मित्र बोले कि यतिन तो ना कह रहा है। हमे यह कहने की जरूरत ही नही पडी कि भैये यतिन की बात तो राम जाने।
कुछ दिन पहले, गुजरात भवन मे उनकी बीबी के साथ टकरा गये। बडी गर्मजोशी के साथ मिले। उन्होने अपनी से पूछा, जानती हो योगेश्जी को। बडे पत्रकार है, काफ़ी पुराने मित्र। दिल्ली जाते ही अपने गुजरात के नेता हिन्दी बोलनी शुरू कर देते हैं ! हर कोई सोचता है की वो संसद मे बोल रहा है।
खुद ही बोले कि कांग्रेस मे ही है। इस मुलाकात को दस दिन भी नही हुए और कल रात हमारे फ़ोटोग्राफ़र ने हमे कहा कि यतिनभाई राजनाथजी के साथ भाजपा की एक बैठक को संबोधित कर रहे हैं!!!! कुछ देर मे भाजपा के फ़ेक्स ने यह बात सही सिद्ध कर दी कि अपने यतिन भाई अब वापिस भाजपाई हो गये हैं । देखे कितने दिन भगवा रंग चढा रहता है उन पर।
जुड गये कांग्रेस मे। और काफ़ी समय तक गुमनामी मे खो रहे। अब जब चुनाव की बात चली तो अपने यतिन भाई का बजार वापिस गर्म हो गया। जब लगा कि कांग्रेस मे दाल नही गलेगी , उन्होने मोदीजी के आसपास घूमना शुरू कर दिया। पर अपने भाई बेवकूफ़ थोडे है। हवा फ़ैल्वा दी, कि यतिन वापिस भाजपा मे आ रहे हैं। नतीजा । अपने यतिन भाई सभी को सफ़ाई देते नजर आये कि इस बात मे दम नही है।
कुछ दिन पहले मिल गये कांग्रेस भवन मे । बोले, योगेश मै शाह्पुर से चुनाव लड रहा हू, कांग्रेस की टिकट पर। उनका वही अंदाज। आखों मे आंख डाल कर। कोई उनकी बातॊ को गलत कैसे मान सकता है। हमने भी उनके दोस्तों को फ़ोन कर कर कह दिया, भैये दो अभिनंदन यतिन को । थोडी देर बाद हमारे फ़ोन की घंटिया बजने लगी। मित्र बोले कि यतिन तो ना कह रहा है। हमे यह कहने की जरूरत ही नही पडी कि भैये यतिन की बात तो राम जाने।
कुछ दिन पहले, गुजरात भवन मे उनकी बीबी के साथ टकरा गये। बडी गर्मजोशी के साथ मिले। उन्होने अपनी से पूछा, जानती हो योगेश्जी को। बडे पत्रकार है, काफ़ी पुराने मित्र। दिल्ली जाते ही अपने गुजरात के नेता हिन्दी बोलनी शुरू कर देते हैं ! हर कोई सोचता है की वो संसद मे बोल रहा है।
खुद ही बोले कि कांग्रेस मे ही है। इस मुलाकात को दस दिन भी नही हुए और कल रात हमारे फ़ोटोग्राफ़र ने हमे कहा कि यतिनभाई राजनाथजी के साथ भाजपा की एक बैठक को संबोधित कर रहे हैं!!!! कुछ देर मे भाजपा के फ़ेक्स ने यह बात सही सिद्ध कर दी कि अपने यतिन भाई अब वापिस भाजपाई हो गये हैं । देखे कितने दिन भगवा रंग चढा रहता है उन पर।
विपक्ष के नेता का चुनावी महासंग्राम
विधानसभा में विपक्ष के नेता अपने दाढी वाले अर्जुनभाई मोढवाडिया चुनावी मैदान में काफी विरोध का सामना कर रहे हैं। उनके मतक्षेत्र पोरबंदर में सर्वाधिक उम्मीदवार १५ है। राज्य के १८२ मतक्षेत्रों में पोरबंदर ही एक ऐसा मतक्षेत्र है जहां १५ उम्मीदवार है। तीन मतक्षेत्रों में १४ हैं।
पूर्व उपमुख्यमंत्री नरहरि अमीन को इस मामले में राहत है। दो बार चुनाव हारने बाद इस बार वो साबरमती छोड़ अहमदाबाद के दूसरे सिरे की ओर के मातर में चले गये हैं।
उनके सामने केवल एक ही उम्मीदवार है, भाजपा का देवुसिंह चौहान। वो कांग्रेस के बागी हैं जो भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं और इसलिये बेचारे नरहरि को नई पिच पर देवुभाई की बागी की फास्ट और स्पीन दोनों ही झेलनी पडे़गी।
शारीरिक और राजनीतिक दोनों ही रुप से हेवीवेट, क्रिकेट में भी हेवीवेट हैं। वे गुजरात क्रिकेट एसोशियेशन के अध्यक्ष हैं और क्रिकेट बोर्ड के उपाध्यक्ष रह चुके हैं।
देखें होम ग्राउन्ड छोड़ विदेशी ग्राउन्ड नरहरि भाई को कितना शुभ होता है।
उधर अपने इकरे शरीर के अर्जुनभाई राजनीति के हेवीवेट हैं। देखें विरोध पक्ष के नेता के रुप में मंझे अपने अर्जुनभाई इस चुनावी संकट से कैसे निपटते हैं।
दाढी वाले मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद को नमो अर्थात झुको कहलवाना पसंद करवाते हैं। अपने अर्जुनभाई मोढवाडिया नमो के सामने अमो अर्थात हम हैं!
उनका कहना है कि उसके सामने इतने सारे उम्मीदवार नमो की चाल है। उनका कहना है कि फिर भी अमो (हम) जीतेंगें।
पूर्व उपमुख्यमंत्री नरहरि अमीन को इस मामले में राहत है। दो बार चुनाव हारने बाद इस बार वो साबरमती छोड़ अहमदाबाद के दूसरे सिरे की ओर के मातर में चले गये हैं।
उनके सामने केवल एक ही उम्मीदवार है, भाजपा का देवुसिंह चौहान। वो कांग्रेस के बागी हैं जो भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं और इसलिये बेचारे नरहरि को नई पिच पर देवुभाई की बागी की फास्ट और स्पीन दोनों ही झेलनी पडे़गी।
शारीरिक और राजनीतिक दोनों ही रुप से हेवीवेट, क्रिकेट में भी हेवीवेट हैं। वे गुजरात क्रिकेट एसोशियेशन के अध्यक्ष हैं और क्रिकेट बोर्ड के उपाध्यक्ष रह चुके हैं।
देखें होम ग्राउन्ड छोड़ विदेशी ग्राउन्ड नरहरि भाई को कितना शुभ होता है।
उधर अपने इकरे शरीर के अर्जुनभाई राजनीति के हेवीवेट हैं। देखें विरोध पक्ष के नेता के रुप में मंझे अपने अर्जुनभाई इस चुनावी संकट से कैसे निपटते हैं।
दाढी वाले मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद को नमो अर्थात झुको कहलवाना पसंद करवाते हैं। अपने अर्जुनभाई मोढवाडिया नमो के सामने अमो अर्थात हम हैं!
उनका कहना है कि उसके सामने इतने सारे उम्मीदवार नमो की चाल है। उनका कहना है कि फिर भी अमो (हम) जीतेंगें।
सुरिन्दर भाई टिकट उडा लाये
अपने सुरिन्दर भाई तो भाई ही हैं । हर दो तीन साल में कुछ कमाल दिखला ही देते हैं । बडी दाडी और गुस्सैल तेवर। सुरिन्दर भाई तो राजपुताना अंदाज बता ही देते हैं। तीन बार हार चुके है। लगा कि शायद पत्नि को खडा कर उसके भाग्य से खुद को चमकाये, पर समय ने साथ नही दिया। फ़िर भी अपने सुरिन्दर भाई राजपुत तो सुरिन्दर भाई हैं। हिम्मत नही हारी। पहुच गये दिल्ली, विधान सभा की टिकट के लिये। डेरा डाल दिया गुजरात भवन में । और टिकट वांछुऒ की तरह सुबह शाम सभी के दरबार मे चक्कर लगाते और कहते की कुछ भी हो जाये, टिकट ले कर ही जायेंगे।
बरसों दिल्ली मे ऎ आई सी सी मे चप्पल घिसटने के बाद अपने सी ऎम राजपुत ने भी इस बार ठान ली कि वो भी टिकट ले कर ही रहेंगे। आकाऒ को कह दिया कि अब और काम काज नहीं। अब तो हम एम एल ऎ बन कर ही रहेंगे। हालत यह कि, कोइ भी पूछे कि सी एम कहां हो आजकल, तपाक से जवाब देते, ६९ दरियापुर-काजीपुर।
ये दो कम नही थे तो अपने कब्बडी उस्ताद हेमंत झाला भी मैदान मे कूद पडे, जै राजस्थान का नारा लगा कर। राजस्थनियो के शाहिबाग मे रहने वाले हेमन्त भाई का कहना था कि उनकी जैन बीबी जिस पर वो पहली नजर मे ही फ़िदा हो गये थे वो उनका एक बहुत बडा वोट बैन्क हैं। इस इलाके मे जैन काफ़ी अधिक संख्या मे हैं।
मजेदार बात तो ये कि दिल्ली मे ये आराम से एक साथ मिलते और चाय पिते हुए बतियाते और अपने एक सूत्री मिशन पर निकल जाते। खैर आखिर मे यह साफ़ हो गया कि ६९ दरियापुर-काजीपुर तो लोजप को मिलेगी।
पर अपने सुरिन्दर भाई तो दिल्ली से नेताजी के अंदाज मे आये। समर्थकों को हवाई अड्डे पर स्वागत के लिये बुलवा लिया। घोषणा कर दी कि टिकट तो उन्हे ही मिलेगी। सब दंग। खैर दबंग सुरिन्दर भाई अपने प्रदेश अध्यक्ष भरतसिंह के खास ठहरे ।
बाद मे मालूम चला कि आखिरी दिन सचमुच मे ही सुरिन्दर भाई ने नामांकन पत्र भर डाला। कुछ का कहना था कि भरतभाई के गिरेबान थाम सुरिन्दर भाई टिकट ले आये। अपने भाई को सब जानते हैं। वो यह सब कुछ कर सकते है। उधर भरत भाई फ़ोन उठावे तो कोई उनसे हकीकत पूछे। वैसे वो उठाते या उनसे मिलते तब भी किसी की हिम्मत नही कि वो कुछ पूछ सके। वो कब क्लास लेना शुरू कर दें कोई कह नहि सकता। एक बार उनका पीरियड शुरू हुआ नही कि खत्म कब होग कोई नही जानता।
बाद मे मालूम पडा कि उन्हे भरतभाई ने लोजपा को फ़िट करने के लिये सशर्त इजाजत दी थी। पर अपने सुरिन्दर भाई तो अडे ही रहे कि टिकट तो उन्हें ही मिली है। आखिरी दिन तो अपने सुरिन्दर भाई गायब ही हो गये। कांग्रेस के नेता जब चुनाव आयोग मे पहुचे तब मालूम पडा कि सुरिन्दर भाई के बिना तो कुछ भी नही। समय पूरा हो गया। सुरिन्दर भाई का नाम मतदान पत्र मे आ गया। भाड मे गई कांग्रेस और कांग्रेस के नेता। नेता तो बस अपने सुरिन्दर भाई !!!!!
बरसों दिल्ली मे ऎ आई सी सी मे चप्पल घिसटने के बाद अपने सी ऎम राजपुत ने भी इस बार ठान ली कि वो भी टिकट ले कर ही रहेंगे। आकाऒ को कह दिया कि अब और काम काज नहीं। अब तो हम एम एल ऎ बन कर ही रहेंगे। हालत यह कि, कोइ भी पूछे कि सी एम कहां हो आजकल, तपाक से जवाब देते, ६९ दरियापुर-काजीपुर।
ये दो कम नही थे तो अपने कब्बडी उस्ताद हेमंत झाला भी मैदान मे कूद पडे, जै राजस्थान का नारा लगा कर। राजस्थनियो के शाहिबाग मे रहने वाले हेमन्त भाई का कहना था कि उनकी जैन बीबी जिस पर वो पहली नजर मे ही फ़िदा हो गये थे वो उनका एक बहुत बडा वोट बैन्क हैं। इस इलाके मे जैन काफ़ी अधिक संख्या मे हैं।
मजेदार बात तो ये कि दिल्ली मे ये आराम से एक साथ मिलते और चाय पिते हुए बतियाते और अपने एक सूत्री मिशन पर निकल जाते। खैर आखिर मे यह साफ़ हो गया कि ६९ दरियापुर-काजीपुर तो लोजप को मिलेगी।
पर अपने सुरिन्दर भाई तो दिल्ली से नेताजी के अंदाज मे आये। समर्थकों को हवाई अड्डे पर स्वागत के लिये बुलवा लिया। घोषणा कर दी कि टिकट तो उन्हे ही मिलेगी। सब दंग। खैर दबंग सुरिन्दर भाई अपने प्रदेश अध्यक्ष भरतसिंह के खास ठहरे ।
बाद मे मालूम चला कि आखिरी दिन सचमुच मे ही सुरिन्दर भाई ने नामांकन पत्र भर डाला। कुछ का कहना था कि भरतभाई के गिरेबान थाम सुरिन्दर भाई टिकट ले आये। अपने भाई को सब जानते हैं। वो यह सब कुछ कर सकते है। उधर भरत भाई फ़ोन उठावे तो कोई उनसे हकीकत पूछे। वैसे वो उठाते या उनसे मिलते तब भी किसी की हिम्मत नही कि वो कुछ पूछ सके। वो कब क्लास लेना शुरू कर दें कोई कह नहि सकता। एक बार उनका पीरियड शुरू हुआ नही कि खत्म कब होग कोई नही जानता।
बाद मे मालूम पडा कि उन्हे भरतभाई ने लोजपा को फ़िट करने के लिये सशर्त इजाजत दी थी। पर अपने सुरिन्दर भाई तो अडे ही रहे कि टिकट तो उन्हें ही मिली है। आखिरी दिन तो अपने सुरिन्दर भाई गायब ही हो गये। कांग्रेस के नेता जब चुनाव आयोग मे पहुचे तब मालूम पडा कि सुरिन्दर भाई के बिना तो कुछ भी नही। समय पूरा हो गया। सुरिन्दर भाई का नाम मतदान पत्र मे आ गया। भाड मे गई कांग्रेस और कांग्रेस के नेता। नेता तो बस अपने सुरिन्दर भाई !!!!!
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