अहमदाबाद के अखबारों मे आज एक आधा पन्ने का विज्ञापन छपा। तानाशाहों को गद्दी से उतार फ़ेकों। बागी भाजपाईयों की सरदार पटेल उत्कर्ष द्वारा दिये गये इस विज्ञापन की विशेषता यह है कि इसमे केशुभाई का फ़ोटो है जिसमे वो हेडलाईन की ओर इशारा करते हुए दिखाई दे रहे है । विज्ञापन मे कहा गया है कि केशुबापा की जनता को अपील- आज परिवर्तन लाने की सख्त जरूरत।
गुजरात और समाज के हित मे पूरी जिन्दगी लगा देने वाले केशुबापा बहुत दुखी हैं । उन्होने भाजपा का प्रचार करने से इंकार कर दिया है। उन्होने यह निर्णय कितने दुखी मन से लिया है यह सोचना। घर मे बैठे मत रहना। मतदान करने के लिये निकलना और परिवर्तन के लिये ही मतदान करना।
केशुभाई भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं और गुजरात के दो बार मुख्य मंत्री रह चुके हैं ।
केशुभाई बागी भाजपाईयो की अगुवाई कर रहे हैं। पिचले कुछ समय से एक व्यवस्थित रूप से कहा जा रहा है कि केशुभाई विरोध मे प्रचार नही करेंगे। यह भी कहा जा रहा है कि केशुभाई अमरीका चले जायेंगे और बागियों को अकेला छोड देंगे। इस विज्ञापन ने इन सभी अफ़वाहों को गलत सिद्ध कर दिया है। साफ़ है कि केशुभाई उनके राजनीतिक दुश्मन नरेंन्द्र मोदी को चुनावी संग्राम मे नही छोडेंगे ।
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Monday, December 3, 2007
Sunday, December 2, 2007
गुलाटमार यतिन वापिस भाजपा में
गुजरात की राजनीति से ले कोर्ट कचहरी तक मे यतिन ऒझा को कौन नही जानता? काफ़ी मशहूर हैं । एक नेता या वकील के रूप मे कम,सनसनीबाज आदमी के रूप मे ज्यादा। मजेदार बात यह है कि इस सबके बावजूद वे अहमदाबाद के जनजीवन मे एक बडा नाम हैं। वो साबरमती के भाजपा के विधायक रह चुके हैं । कुछ साल पहले नाराज हो गये। तत्कालीन मुख्य मन्त्री केशुभाई पटेल को कुछ पत्र दाग, भाजपा को गालियां बक भाजपा को अलविदा कह दी।
जुड गये कांग्रेस मे। और काफ़ी समय तक गुमनामी मे खो रहे। अब जब चुनाव की बात चली तो अपने यतिन भाई का बजार वापिस गर्म हो गया। जब लगा कि कांग्रेस मे दाल नही गलेगी , उन्होने मोदीजी के आसपास घूमना शुरू कर दिया। पर अपने भाई बेवकूफ़ थोडे है। हवा फ़ैल्वा दी, कि यतिन वापिस भाजपा मे आ रहे हैं। नतीजा । अपने यतिन भाई सभी को सफ़ाई देते नजर आये कि इस बात मे दम नही है।
कुछ दिन पहले मिल गये कांग्रेस भवन मे । बोले, योगेश मै शाह्पुर से चुनाव लड रहा हू, कांग्रेस की टिकट पर। उनका वही अंदाज। आखों मे आंख डाल कर। कोई उनकी बातॊ को गलत कैसे मान सकता है। हमने भी उनके दोस्तों को फ़ोन कर कर कह दिया, भैये दो अभिनंदन यतिन को । थोडी देर बाद हमारे फ़ोन की घंटिया बजने लगी। मित्र बोले कि यतिन तो ना कह रहा है। हमे यह कहने की जरूरत ही नही पडी कि भैये यतिन की बात तो राम जाने।
कुछ दिन पहले, गुजरात भवन मे उनकी बीबी के साथ टकरा गये। बडी गर्मजोशी के साथ मिले। उन्होने अपनी से पूछा, जानती हो योगेश्जी को। बडे पत्रकार है, काफ़ी पुराने मित्र। दिल्ली जाते ही अपने गुजरात के नेता हिन्दी बोलनी शुरू कर देते हैं ! हर कोई सोचता है की वो संसद मे बोल रहा है।
खुद ही बोले कि कांग्रेस मे ही है। इस मुलाकात को दस दिन भी नही हुए और कल रात हमारे फ़ोटोग्राफ़र ने हमे कहा कि यतिनभाई राजनाथजी के साथ भाजपा की एक बैठक को संबोधित कर रहे हैं!!!! कुछ देर मे भाजपा के फ़ेक्स ने यह बात सही सिद्ध कर दी कि अपने यतिन भाई अब वापिस भाजपाई हो गये हैं । देखे कितने दिन भगवा रंग चढा रहता है उन पर।
जुड गये कांग्रेस मे। और काफ़ी समय तक गुमनामी मे खो रहे। अब जब चुनाव की बात चली तो अपने यतिन भाई का बजार वापिस गर्म हो गया। जब लगा कि कांग्रेस मे दाल नही गलेगी , उन्होने मोदीजी के आसपास घूमना शुरू कर दिया। पर अपने भाई बेवकूफ़ थोडे है। हवा फ़ैल्वा दी, कि यतिन वापिस भाजपा मे आ रहे हैं। नतीजा । अपने यतिन भाई सभी को सफ़ाई देते नजर आये कि इस बात मे दम नही है।
कुछ दिन पहले मिल गये कांग्रेस भवन मे । बोले, योगेश मै शाह्पुर से चुनाव लड रहा हू, कांग्रेस की टिकट पर। उनका वही अंदाज। आखों मे आंख डाल कर। कोई उनकी बातॊ को गलत कैसे मान सकता है। हमने भी उनके दोस्तों को फ़ोन कर कर कह दिया, भैये दो अभिनंदन यतिन को । थोडी देर बाद हमारे फ़ोन की घंटिया बजने लगी। मित्र बोले कि यतिन तो ना कह रहा है। हमे यह कहने की जरूरत ही नही पडी कि भैये यतिन की बात तो राम जाने।
कुछ दिन पहले, गुजरात भवन मे उनकी बीबी के साथ टकरा गये। बडी गर्मजोशी के साथ मिले। उन्होने अपनी से पूछा, जानती हो योगेश्जी को। बडे पत्रकार है, काफ़ी पुराने मित्र। दिल्ली जाते ही अपने गुजरात के नेता हिन्दी बोलनी शुरू कर देते हैं ! हर कोई सोचता है की वो संसद मे बोल रहा है।
खुद ही बोले कि कांग्रेस मे ही है। इस मुलाकात को दस दिन भी नही हुए और कल रात हमारे फ़ोटोग्राफ़र ने हमे कहा कि यतिनभाई राजनाथजी के साथ भाजपा की एक बैठक को संबोधित कर रहे हैं!!!! कुछ देर मे भाजपा के फ़ेक्स ने यह बात सही सिद्ध कर दी कि अपने यतिन भाई अब वापिस भाजपाई हो गये हैं । देखे कितने दिन भगवा रंग चढा रहता है उन पर।
विपक्ष के नेता का चुनावी महासंग्राम
विधानसभा में विपक्ष के नेता अपने दाढी वाले अर्जुनभाई मोढवाडिया चुनावी मैदान में काफी विरोध का सामना कर रहे हैं। उनके मतक्षेत्र पोरबंदर में सर्वाधिक उम्मीदवार १५ है। राज्य के १८२ मतक्षेत्रों में पोरबंदर ही एक ऐसा मतक्षेत्र है जहां १५ उम्मीदवार है। तीन मतक्षेत्रों में १४ हैं।
पूर्व उपमुख्यमंत्री नरहरि अमीन को इस मामले में राहत है। दो बार चुनाव हारने बाद इस बार वो साबरमती छोड़ अहमदाबाद के दूसरे सिरे की ओर के मातर में चले गये हैं।
उनके सामने केवल एक ही उम्मीदवार है, भाजपा का देवुसिंह चौहान। वो कांग्रेस के बागी हैं जो भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं और इसलिये बेचारे नरहरि को नई पिच पर देवुभाई की बागी की फास्ट और स्पीन दोनों ही झेलनी पडे़गी।
शारीरिक और राजनीतिक दोनों ही रुप से हेवीवेट, क्रिकेट में भी हेवीवेट हैं। वे गुजरात क्रिकेट एसोशियेशन के अध्यक्ष हैं और क्रिकेट बोर्ड के उपाध्यक्ष रह चुके हैं।
देखें होम ग्राउन्ड छोड़ विदेशी ग्राउन्ड नरहरि भाई को कितना शुभ होता है।
उधर अपने इकरे शरीर के अर्जुनभाई राजनीति के हेवीवेट हैं। देखें विरोध पक्ष के नेता के रुप में मंझे अपने अर्जुनभाई इस चुनावी संकट से कैसे निपटते हैं।
दाढी वाले मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद को नमो अर्थात झुको कहलवाना पसंद करवाते हैं। अपने अर्जुनभाई मोढवाडिया नमो के सामने अमो अर्थात हम हैं!
उनका कहना है कि उसके सामने इतने सारे उम्मीदवार नमो की चाल है। उनका कहना है कि फिर भी अमो (हम) जीतेंगें।
पूर्व उपमुख्यमंत्री नरहरि अमीन को इस मामले में राहत है। दो बार चुनाव हारने बाद इस बार वो साबरमती छोड़ अहमदाबाद के दूसरे सिरे की ओर के मातर में चले गये हैं।
उनके सामने केवल एक ही उम्मीदवार है, भाजपा का देवुसिंह चौहान। वो कांग्रेस के बागी हैं जो भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं और इसलिये बेचारे नरहरि को नई पिच पर देवुभाई की बागी की फास्ट और स्पीन दोनों ही झेलनी पडे़गी।
शारीरिक और राजनीतिक दोनों ही रुप से हेवीवेट, क्रिकेट में भी हेवीवेट हैं। वे गुजरात क्रिकेट एसोशियेशन के अध्यक्ष हैं और क्रिकेट बोर्ड के उपाध्यक्ष रह चुके हैं।
देखें होम ग्राउन्ड छोड़ विदेशी ग्राउन्ड नरहरि भाई को कितना शुभ होता है।
उधर अपने इकरे शरीर के अर्जुनभाई राजनीति के हेवीवेट हैं। देखें विरोध पक्ष के नेता के रुप में मंझे अपने अर्जुनभाई इस चुनावी संकट से कैसे निपटते हैं।
दाढी वाले मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद को नमो अर्थात झुको कहलवाना पसंद करवाते हैं। अपने अर्जुनभाई मोढवाडिया नमो के सामने अमो अर्थात हम हैं!
उनका कहना है कि उसके सामने इतने सारे उम्मीदवार नमो की चाल है। उनका कहना है कि फिर भी अमो (हम) जीतेंगें।
सुरिन्दर भाई टिकट उडा लाये
अपने सुरिन्दर भाई तो भाई ही हैं । हर दो तीन साल में कुछ कमाल दिखला ही देते हैं । बडी दाडी और गुस्सैल तेवर। सुरिन्दर भाई तो राजपुताना अंदाज बता ही देते हैं। तीन बार हार चुके है। लगा कि शायद पत्नि को खडा कर उसके भाग्य से खुद को चमकाये, पर समय ने साथ नही दिया। फ़िर भी अपने सुरिन्दर भाई राजपुत तो सुरिन्दर भाई हैं। हिम्मत नही हारी। पहुच गये दिल्ली, विधान सभा की टिकट के लिये। डेरा डाल दिया गुजरात भवन में । और टिकट वांछुऒ की तरह सुबह शाम सभी के दरबार मे चक्कर लगाते और कहते की कुछ भी हो जाये, टिकट ले कर ही जायेंगे।
बरसों दिल्ली मे ऎ आई सी सी मे चप्पल घिसटने के बाद अपने सी ऎम राजपुत ने भी इस बार ठान ली कि वो भी टिकट ले कर ही रहेंगे। आकाऒ को कह दिया कि अब और काम काज नहीं। अब तो हम एम एल ऎ बन कर ही रहेंगे। हालत यह कि, कोइ भी पूछे कि सी एम कहां हो आजकल, तपाक से जवाब देते, ६९ दरियापुर-काजीपुर।
ये दो कम नही थे तो अपने कब्बडी उस्ताद हेमंत झाला भी मैदान मे कूद पडे, जै राजस्थान का नारा लगा कर। राजस्थनियो के शाहिबाग मे रहने वाले हेमन्त भाई का कहना था कि उनकी जैन बीबी जिस पर वो पहली नजर मे ही फ़िदा हो गये थे वो उनका एक बहुत बडा वोट बैन्क हैं। इस इलाके मे जैन काफ़ी अधिक संख्या मे हैं।
मजेदार बात तो ये कि दिल्ली मे ये आराम से एक साथ मिलते और चाय पिते हुए बतियाते और अपने एक सूत्री मिशन पर निकल जाते। खैर आखिर मे यह साफ़ हो गया कि ६९ दरियापुर-काजीपुर तो लोजप को मिलेगी।
पर अपने सुरिन्दर भाई तो दिल्ली से नेताजी के अंदाज मे आये। समर्थकों को हवाई अड्डे पर स्वागत के लिये बुलवा लिया। घोषणा कर दी कि टिकट तो उन्हे ही मिलेगी। सब दंग। खैर दबंग सुरिन्दर भाई अपने प्रदेश अध्यक्ष भरतसिंह के खास ठहरे ।
बाद मे मालूम चला कि आखिरी दिन सचमुच मे ही सुरिन्दर भाई ने नामांकन पत्र भर डाला। कुछ का कहना था कि भरतभाई के गिरेबान थाम सुरिन्दर भाई टिकट ले आये। अपने भाई को सब जानते हैं। वो यह सब कुछ कर सकते है। उधर भरत भाई फ़ोन उठावे तो कोई उनसे हकीकत पूछे। वैसे वो उठाते या उनसे मिलते तब भी किसी की हिम्मत नही कि वो कुछ पूछ सके। वो कब क्लास लेना शुरू कर दें कोई कह नहि सकता। एक बार उनका पीरियड शुरू हुआ नही कि खत्म कब होग कोई नही जानता।
बाद मे मालूम पडा कि उन्हे भरतभाई ने लोजपा को फ़िट करने के लिये सशर्त इजाजत दी थी। पर अपने सुरिन्दर भाई तो अडे ही रहे कि टिकट तो उन्हें ही मिली है। आखिरी दिन तो अपने सुरिन्दर भाई गायब ही हो गये। कांग्रेस के नेता जब चुनाव आयोग मे पहुचे तब मालूम पडा कि सुरिन्दर भाई के बिना तो कुछ भी नही। समय पूरा हो गया। सुरिन्दर भाई का नाम मतदान पत्र मे आ गया। भाड मे गई कांग्रेस और कांग्रेस के नेता। नेता तो बस अपने सुरिन्दर भाई !!!!!
बरसों दिल्ली मे ऎ आई सी सी मे चप्पल घिसटने के बाद अपने सी ऎम राजपुत ने भी इस बार ठान ली कि वो भी टिकट ले कर ही रहेंगे। आकाऒ को कह दिया कि अब और काम काज नहीं। अब तो हम एम एल ऎ बन कर ही रहेंगे। हालत यह कि, कोइ भी पूछे कि सी एम कहां हो आजकल, तपाक से जवाब देते, ६९ दरियापुर-काजीपुर।
ये दो कम नही थे तो अपने कब्बडी उस्ताद हेमंत झाला भी मैदान मे कूद पडे, जै राजस्थान का नारा लगा कर। राजस्थनियो के शाहिबाग मे रहने वाले हेमन्त भाई का कहना था कि उनकी जैन बीबी जिस पर वो पहली नजर मे ही फ़िदा हो गये थे वो उनका एक बहुत बडा वोट बैन्क हैं। इस इलाके मे जैन काफ़ी अधिक संख्या मे हैं।
मजेदार बात तो ये कि दिल्ली मे ये आराम से एक साथ मिलते और चाय पिते हुए बतियाते और अपने एक सूत्री मिशन पर निकल जाते। खैर आखिर मे यह साफ़ हो गया कि ६९ दरियापुर-काजीपुर तो लोजप को मिलेगी।
पर अपने सुरिन्दर भाई तो दिल्ली से नेताजी के अंदाज मे आये। समर्थकों को हवाई अड्डे पर स्वागत के लिये बुलवा लिया। घोषणा कर दी कि टिकट तो उन्हे ही मिलेगी। सब दंग। खैर दबंग सुरिन्दर भाई अपने प्रदेश अध्यक्ष भरतसिंह के खास ठहरे ।
बाद मे मालूम चला कि आखिरी दिन सचमुच मे ही सुरिन्दर भाई ने नामांकन पत्र भर डाला। कुछ का कहना था कि भरतभाई के गिरेबान थाम सुरिन्दर भाई टिकट ले आये। अपने भाई को सब जानते हैं। वो यह सब कुछ कर सकते है। उधर भरत भाई फ़ोन उठावे तो कोई उनसे हकीकत पूछे। वैसे वो उठाते या उनसे मिलते तब भी किसी की हिम्मत नही कि वो कुछ पूछ सके। वो कब क्लास लेना शुरू कर दें कोई कह नहि सकता। एक बार उनका पीरियड शुरू हुआ नही कि खत्म कब होग कोई नही जानता।
बाद मे मालूम पडा कि उन्हे भरतभाई ने लोजपा को फ़िट करने के लिये सशर्त इजाजत दी थी। पर अपने सुरिन्दर भाई तो अडे ही रहे कि टिकट तो उन्हें ही मिली है। आखिरी दिन तो अपने सुरिन्दर भाई गायब ही हो गये। कांग्रेस के नेता जब चुनाव आयोग मे पहुचे तब मालूम पडा कि सुरिन्दर भाई के बिना तो कुछ भी नही। समय पूरा हो गया। सुरिन्दर भाई का नाम मतदान पत्र मे आ गया। भाड मे गई कांग्रेस और कांग्रेस के नेता। नेता तो बस अपने सुरिन्दर भाई !!!!!
Friday, November 2, 2007
मीडिया मे चुनाव का सट्टा
हालांकि गुजरात मे चुनाव को अभी ४० से अधिक दिन बाकी है, चुनावी अटकलों का दौर पूरे जोर शोर से चल रहा है। कोइ भी मिलता है तो पूछता है कि क्या चल रहा है? आप इसका जवाब दे उससे पहले ही वो बंदा अगला सवाल दाग देता है। और क्या लगता है इस बार? कौन आयेगा?
पत्रकारो की दुनिया हो या छुटभैयो की जमात या फ़िर खाली बैठे लोगो की चौपाल। सभी जगह बस एक ही सवाल।
साफ़ है की सट्टा बज़्जार इससे अछूता नही रह सकता। पर भाई अपन होली दिवाली ताश शायद खेल ले, सट्टा बज़ार तो अपने बस की बात नही। खैर कल टाईम्स आफ़ इंडिया पढा। उसमे सट्टा बज़ार की रेपोर्ट पढी। लगा की बज़ार तो कांग्रेस का ही है। अलग अलग दिनॊ के दाम लिखे थे अपने रिपोर्टर भाई ने अपने खुद के नाम के साथ।
हिमान्शु कौशिक का कहना है कि हमेशा कांग्रेस ही आगे रही है, भले दाम मे कुछ उतार चढाव रहा हो। ३० अकतूबर को भाजपा के ९८ के सामने कांग्रेस के ८४ पैसे ही थे। तहलका के बाद तो भाजपा का दम ११२ को छू गया था। कारण ? तहलका से भाजपा की छवी काफ़ी बिगडी थी।
आज गुजराती अखबार संदेश मे दाम देखे। इस रिपोर्ट मे बिल्कुल ही उलटी तसवीर थी।भाजपा की ९० बैठकों के लिये ३२ से ३७ पैसे और कांग्रेस की ८० बैठको के लिये भी १.८० से १.९०। इस रिपोर्ट मे तो भाजपा की १२५ बैठको के लिये रू६.५० तो कांग्रेस के रू२१।
क्या आप दाम लगाना चाहेंगे कि कौन सा अखबार सही लिख रहा है और कौन किसी और गणित से लिख रहा है ?
पत्रकारो की दुनिया हो या छुटभैयो की जमात या फ़िर खाली बैठे लोगो की चौपाल। सभी जगह बस एक ही सवाल।
साफ़ है की सट्टा बज़्जार इससे अछूता नही रह सकता। पर भाई अपन होली दिवाली ताश शायद खेल ले, सट्टा बज़ार तो अपने बस की बात नही। खैर कल टाईम्स आफ़ इंडिया पढा। उसमे सट्टा बज़ार की रेपोर्ट पढी। लगा की बज़ार तो कांग्रेस का ही है। अलग अलग दिनॊ के दाम लिखे थे अपने रिपोर्टर भाई ने अपने खुद के नाम के साथ।
हिमान्शु कौशिक का कहना है कि हमेशा कांग्रेस ही आगे रही है, भले दाम मे कुछ उतार चढाव रहा हो। ३० अकतूबर को भाजपा के ९८ के सामने कांग्रेस के ८४ पैसे ही थे। तहलका के बाद तो भाजपा का दम ११२ को छू गया था। कारण ? तहलका से भाजपा की छवी काफ़ी बिगडी थी।
आज गुजराती अखबार संदेश मे दाम देखे। इस रिपोर्ट मे बिल्कुल ही उलटी तसवीर थी।भाजपा की ९० बैठकों के लिये ३२ से ३७ पैसे और कांग्रेस की ८० बैठको के लिये भी १.८० से १.९०। इस रिपोर्ट मे तो भाजपा की १२५ बैठको के लिये रू६.५० तो कांग्रेस के रू२१।
क्या आप दाम लगाना चाहेंगे कि कौन सा अखबार सही लिख रहा है और कौन किसी और गणित से लिख रहा है ?
अकीक के कारीगरॊं पर सिलीकोसिस का काला साया
गुजरात के खम्भात क्षेत्र का अकीक पत्थर का व्यव्साय काफ़ी पुराना है। उतनी ही पुरानी है उनकी सिलीकोसिस की जान लेवा बिमारी की समस्या। पहले किसी को इस बिमारी के बारे मे मालूम नही था, और आज जब सभी को मालूम है कि यह क्या है, तब भी किसी को इस काम मे जुटे गरी कारिगरों की कोई चिंता नही है।
२० वर्ष की उम्र मे इस काम मे लगे व्यक्ति की ४० की उम्र तक तो हालत खस्ता हो जाती है। पिछले २० से अधिक वर्षो से यह मामला मीडिया मे भी चमक रहा है, पर इसका कोई असर ही नही। हाल ही मे PUCL की एक टुकडी यहा सर्वेक्षण करके आयी। उसके अनुसार इस वर्ष अभी तक १३ व्यक्ति मर चुके हैं, पिछले वर्ष १२ मरे थे।
मरने वालों से अधिक चिंता का विषय है सड सड कर मौत की तरफ़ जाना। खम्भात मे ३०,००० से अधिक लोग इस व्यवसाय मे हैं। इसमे अधिकांश पिछडी जाती के हैं। इनका काम पत्थरों को घिस कर, पोलिश कर चमकाना है।
यदि फ़ेक्टरी कानून को देखे तो वह यहा इन मजदूरे के लिये है ही नही। अगर उसे लागू भी किया जाये तो केवल इन मजदूरो को ही नुकसान होगा। फ़ेक्टरी के बंद हो जाने से जो दो पैसे आज मिलते हैं वो भी बन्द हो जायेंगे । इस समस्या का निदान केवल मात्र इन कारीगरों को बेह्तर काम करने की सुविधा उपलब्ध कराना है।
पर वो कराये कौन?
२० वर्ष की उम्र मे इस काम मे लगे व्यक्ति की ४० की उम्र तक तो हालत खस्ता हो जाती है। पिछले २० से अधिक वर्षो से यह मामला मीडिया मे भी चमक रहा है, पर इसका कोई असर ही नही। हाल ही मे PUCL की एक टुकडी यहा सर्वेक्षण करके आयी। उसके अनुसार इस वर्ष अभी तक १३ व्यक्ति मर चुके हैं, पिछले वर्ष १२ मरे थे।
मरने वालों से अधिक चिंता का विषय है सड सड कर मौत की तरफ़ जाना। खम्भात मे ३०,००० से अधिक लोग इस व्यवसाय मे हैं। इसमे अधिकांश पिछडी जाती के हैं। इनका काम पत्थरों को घिस कर, पोलिश कर चमकाना है।
यदि फ़ेक्टरी कानून को देखे तो वह यहा इन मजदूरे के लिये है ही नही। अगर उसे लागू भी किया जाये तो केवल इन मजदूरो को ही नुकसान होगा। फ़ेक्टरी के बंद हो जाने से जो दो पैसे आज मिलते हैं वो भी बन्द हो जायेंगे । इस समस्या का निदान केवल मात्र इन कारीगरों को बेह्तर काम करने की सुविधा उपलब्ध कराना है।
पर वो कराये कौन?
Thursday, November 1, 2007
नेता सम्मान करने मे जुटे हुए....
कुछ दिन पहले कांग्रेस ने शहर के एक युवा वकील देवांग नानावटी का सम्मान किया । कारण ? नानावटी टाईम्स आफ़ इंडिया के लीड इंडिया कार्यक्रम मे गुजरात मे प्रथम आये थे। देखा जाये तो इस प्रकार के कार्यक्रम को कोइ महत्व नही देता है। खैर, भाजपा क्यो पीछे रहती। भाजपा ने कल नानावटी का सम्मान कर डाला।
कल ही कांग्रेस ने ओलंपिक के लिये रेस वोकिंग के लिये चुने गये बाबुभाई का करमसद ले जा सम्मान कर डाला। उनका सम्मान सरदार पटेल जयन्ति के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम मे किया गया। मजेदार बात यह है कि एक दिन पहले मुक्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनका सम्मान उनके कार्यालय मे किया था!!!
पिछले हफ़्ते कांग्रेस को जब भाजपा की डोक्टेरों की मीटिंग के बारे मे मालूम चला तब एक दिन पहले ही डोक्टेरों की मीटिंग कर डाली। प्रदेश अध्यक्ष भरत सोलंकी ने कह कि पांच डोक्टरों को कांग्रेस को टिकट देगी। सभी को मालूम है कि हर विधान सभा मे आधा दर्जन डोक्टर तो होते ही है।
पर नतीजा यह हुअ कि अगले दिन की मोदीजी की डोक्टेरों की मीटिंग फ़ीकी पड गई।
देखा मतदाता राजा है, पर केवल मतदान के दिन तक!!!!!!!!!
कल ही कांग्रेस ने ओलंपिक के लिये रेस वोकिंग के लिये चुने गये बाबुभाई का करमसद ले जा सम्मान कर डाला। उनका सम्मान सरदार पटेल जयन्ति के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम मे किया गया। मजेदार बात यह है कि एक दिन पहले मुक्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनका सम्मान उनके कार्यालय मे किया था!!!
पिछले हफ़्ते कांग्रेस को जब भाजपा की डोक्टेरों की मीटिंग के बारे मे मालूम चला तब एक दिन पहले ही डोक्टेरों की मीटिंग कर डाली। प्रदेश अध्यक्ष भरत सोलंकी ने कह कि पांच डोक्टरों को कांग्रेस को टिकट देगी। सभी को मालूम है कि हर विधान सभा मे आधा दर्जन डोक्टर तो होते ही है।
पर नतीजा यह हुअ कि अगले दिन की मोदीजी की डोक्टेरों की मीटिंग फ़ीकी पड गई।
देखा मतदाता राजा है, पर केवल मतदान के दिन तक!!!!!!!!!
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