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Saturday, July 28, 2007

गुजरात के सांसद जेटली गुजरात आ रहे है!

अरुण जेटली गुजरात के सांसद हैं। उनका गुजरात आना एक समाचार बन जाता है। वो कब आते है, कब चले जाते है, क्या कर जाते है वह शायद केवल भाजपा कार्यालय के रिकार्ड की बाबत है, जिस तरह संसद में उनका गुजरात का प्रतिनिधि होना।

गुजरात भाजपा के मीडिया को आर्डिनेटर और जेटलीजी के अहमदाबाद के एक निकटतम सूत्र यमल व्यास बतलाते है कि जेटलीजी पिछ्ली बार अप्रैल में आए थे। प्रयोजन था चेम्बर में एक कार्यक्रम । वैसे भी राज्यसभा सांसदो को आम आदमी से नाता ही क्या?

पहले महिने दो महिने में चक्कर मार लेते थे, पर जबसे उन्होने माधुपुरा बैंक का कई हजार घोटाला संभाला है सब कुछ दिल्ली में ही निपटा लेते हैं। वो घोटालेबाजो की पैरवी कर रहे हैं। क्योंकि केस सुप्रीम कोर्ट में था इसलिये वे घोटालेबाजो को दिल्ली में ही मिल लेते है।

यह बैंक घोटाला इतना बडा था कि गुजरात की १०० से ज्यादह बैंक इसके कारण डूबने के कगार पर आ गई। नतीजा यह हुआ कि इससे लोगो ने जेटलीजी का अहमदाबाद आना ही बंद करवा दिया!

खैर अब जब वो आ रहे हैं तो मोदीजी अपनी जेड प्लस सिक्योरिटी दे कर भी उन्हे बचायेंगे। वैसे मोदी-जेटली रिश्ता काफ़ी प्रेम भरा है। पर अब तो अपने जेटलीजी मोदीजी के भाजपा इलेक्शन एजेंट बन कर आ रहे हैं।

राजनाथसिंहजी ने आगामी विधानसभा चुनाव की बागडोर तो मोदी जी के हाथ में सौंपते हुए कहा कि आपके प्रिय अरुण जेटली इस कार्य में आपके सहयोगी होंगे।

Wednesday, July 11, 2007

अब मोदी और गुजरात जिन्‍ना विवाद में

लालकृष्‍ण आडवाणी के बाद उनके शिष्‍य गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेन्‍द्र मोदी जिन्‍ना विवाद में फ़ंस रहे हैं। इसके केन्‍द्र में है राज्‍य सरकार के पाक्षिक गुजरात में जिन्‍ना की प्रशंसा करता हुआ लेख- जिन्‍ना का खास दोस्‍त हिन्दू था।

यह लेख जून १६ के अंक में छपा था। और यदि सरकार के दावे पर विश्‍वास करें तो गुजरात का सरकुलेशन दो लाख से अधिक है। यह इस पाक्षिक में छपता है। यह कहता है कि गुजरात यानि कि सरकार का नहीं, साडे पांच करोड गुजरातियों का "गुजरात" है। पर यह बात अलग है कि यह विवाद इस समाचार के एक अंग्रेजी अखबार मे ६ जुलाई के छपने के बाद हुआ । यह अखबार दो लाख नही बिकता।

इस लेख में कहा गया है कि हिंदू नेताओं ने जिन्‍ना से संबंध काट दिए थे, इसलिए उससे किसी भी प्रकार के संवाद के रास्‍ते बंद हो गये। जिन्‍ना इससे बहुत ही व्‍यथित और कटु हो गये।

लेखक गुणवंत शाह ने जिन्‍ना के एक करीबी "दोस्‍त" कानजी द्वारकादास का उल्‍लेख करते हुए कहा है कि जिन्‍ना के आत्‍म सम्‍मान को ठेस पहुंची थी और इसलिए वे कटु हो गये और उनके आसपास अविश्‍वास का वातावरण हो गया।

विहिप नेता प्रवीण तोगडिया ने तो जिस दिन इस लेख की रिपोर्ट एक अंग्रेजी अखबार में छपी उसी दिन उसकी भर्तत्‍सना की थी। मौका नहीं चूकते हुए विपक्ष के नेता ने भी इस लेख के लिए मोदी पर बंदूके तानी है।

पाक्षिक के एक्‍जीक्‍युटिव एडीटर सुघीर रावल का इस विषय में बहुत औपचारिक जवाब है कि ये लेखक के अपने विचार हैं। क्‍या यह इतना आसान है? क्‍या किसी कांग्रेसी नेता या आम आदमी द्वारा मोदी के विरुद्ध लिखे गए लेख पर भी क्‍या उनका यही रवैया होगा?

देखे इस चुनावी वर्ष मे किसे क्या फ़ायदा होता है।

Tuesday, July 10, 2007

मोदी को हराने के लिये कांग्रेस अंकल साम की शरण में

गुजरात में इस वर्ष होने वाले विधानसभा के चुनावों पर पूरे हिन्‍दुस्‍तान की नहीं दुनिया की नजर है। चुनाव का केन्‍द्र अपने मोदीजी ही हैं।

पिछ्ली बार तो उनकी गाडी गोधरा कांड की आग से पूरी तेज गति से चल पडी थी। इस बार उनका नारा विकास का नारा है ( अभी तक तो है)। चुनाव के आखिरी दिनों में यह ऊंट (कहावत वाला) कहां बैठता है यह तो शायद ऊंट को भी नहीं मालूम।

खैर अपने कांग्रेसी पूरा जोर लगा रहे हैं, मोदीजी को हराने के लिये। शायद ही कभी चुनाव के एक वर्ष पूर्व चुनावी बिगुल और युध्ध के ढोल ताशे बजे होंगे। आखिरकार मोदीजी को हराना मतलब हिन्‍दू ताकत को खत्‍म करना। भाजपा के एक मात्र बचे हुए हिन्दू चेहरे को मिटाना।

अपने कांग्रेस के प्रतिपक्ष के नेता, मोदीजी की तर्ज की दाढी वाले अर्जुन मोढवाडिया, युवा शक्‍ति का नेता बने रहने में मशगूल प्रदेशाध्य्क्ष भरत सोलंकी एडी चोटी का जोर ही नहीं दिल्‍ली से अमरीका तक की दौड भी लगा रहे हैं। किसी तरह से भी मोदी की छुठ्ठी कर मुख्यमंत्री की कुर्सी हथिया लें। वो कभी साईकल पर पोरबंदर तक गांधीगिरी करने जाते है तो कभी आदिवासियों के साथ मोदी सरकार पर तीर कमान खींचते हैं।

भैय्‍ये बार बार अपनी सोनियाजी को बुला लाते हैं। अगर वो नहीं आती तो उनके राजनीतिक सलाहकार अपने गुजरात के अहमद पटेल को बुला श्रोताओं को उनके कुछ शेर सुनवा देते हैं।

अब तो वो अमरीका से साम अंकल की मदद ले रहे हैं। अरे साम अंकल यानी कि अपने सत्‍यनारायण गंगाराम पित्रोडा । जब तक हिन्‍दुस्‍तान में थे तब तक वे सत्‍यनारायण गंगाराम पित्रोडा ही थे। अमरीका जाते ही वे साम पित्रोडा हो गये। कहा है ना कि रोम में रोमन की तरह रहे। अमरीका में अपने सत्‍यनारायण भैय्‍या ने तो नाम भी अमरीकी रख लिया और साम हो गये। वे अपने भरत और अर्जुन को ऎसा गुजरात बनाने का गुर बतायेंगे कि गुजरात के लोग गुड पर मधुमख्‍खी की तरह भनभनाते हुए बैलेट बोक्‍स में केवल पंजे से पंजा मिला जीत की तालियां बजायेंगे।

मालूम है वो क्‍या करेंगे। वो गुजरात कांग्रेस के लिये मैनीफ़ेस्‍टो यानि कि चुनावी घोषणापत्र बनायेंगे।

मित्रों साम भैय्‍या को कम मत समझना। वे भारत के नोलिज कमीशन के अध्‍यक्ष हैं। शंकरसिंह वाघेला ने गुजरात के ज्ञानियों का जो दरबार रचा था उसके एक मंत्री थे। उसके बाद कई सरकार आई पर वह दरबार ही नहीं लगा। पर अपने सत्‍तू भैय्‍या उर्फ़ साम काका (अंकल को गुजराती में काका कहते हैं, पंजाबी वाला काका नही) गुजरात के चुनावी क्षितिज पर उभरेंगे। वेलकम अंकल साम।

Monday, June 25, 2007

सुनीता विलियम्स का यान मोदी विरोधी खेमे मे

सुनीता दीदी वापिस आ गई। समाचार है कि उनका यान केलिफ़ोर्निया में उतरा है। सच ही होगा। पर हमारा मानना है कि उनके यान का कोई रुहानी रुप गुजरात के राजनीतिक गगन में पिछ्ले कई महिनो से विहार करते करते अब गुजरात में मोदी विरोधी खेमे में उतरा है।


वे गुजरात की है कयोकि उनके पिताजी गुजरात के है। भले ही वे अब तक केवल दो बार ही गुजरात आई है, पूरा गुजरात उन पर इस तरह फ़िदा हो रहा है जैसे कि वो अट्लांटिस का दरवाजा गुजरात में खोल कर ही चढी थी । आखिरकार हमारे मोदीजी ने हर गुजराती को हर उस चीज पर खुशी मनाना सिखलाया है जो किसी भी तरह गुजरात से जोडी जा सकती है।
अपने मोदीजी आज के मार्केटिंग गुरु है। वे दुनिया के बाजार में ब्रान्ड गुजरात काफ़ी अच्छी तरह से बेच रहे है। इसमे कुछ बुरा भी नही है। और आज सहकारी बैन्को से ले चेम्बर ओफ़ कोमर्स तक सभी इस मोदी ज्वार में आन्दोलित है। पूरा गुजरात vibrant गुजरात हो गया है । पर सुनीता विलियम्स एक ऎसा नाम है जिसके गुजराती कनेक्शन के बावजूद मोदीजी चुप है।

उनकी इस चुप्पी के कारण गुजरात के राजनैतिक गगन में वक्त वक्त पर कान्ग्रेसी आंधी के बादल आते रहते है। कान्ग्रेस के लिये सुनीता शब्द मोदीजी को खामोश करने का ब्रह्मास्त्र बन गया था बजट सत्र में । मोदीजी जैसी दाढी वाले कान्ग्रेस के अर्जुन मोढ्वाढिया जी ने बजट सत्र में तीन बार सुनीता विलियम्स के सम्मान का मुद्दा उठाया, पर खुद ही बोल बोल कर चुप हो गये क्योकि मोदीजी ने मौन धारण कर रखा ।

आज गुजरात के अखबार में सुनीता के समाचार है । पहले भी कई बार आ चुके है । मोदीजी को तो छोडो उनके स्वास्थ्य मन्त्री सनसनी सम्राट अशोक भट्ट भी चुप है। वो सुर्खियो में आने के किसी भी मौके को नही छोडते है। वो दुनिया की सबसे सात्विक चीज में भी कुछ ना कुछ भयानक ढुंढ लेते है। एक बार विधानसभा में बोले कि गुजरात मे मच्छर इसलिये ज्यादा है क्योंकि पाकिस्तान सरहदी जिले बनासकांठा में पानी छोड रहा है। यह उनका जवाब था जब किसी ने मलेरिया के बारे मे प्रश्न किया !

कुछ दिन पहले विश्व गुजराती समाज ने एक प्रस्ताव पास कर सुनीता के लिये शुभकामनाए की और घोषणा की कि जब वे गुजरात आएगी तब उनका सम्मान किया जायेगा। इसी सप्ताह कान्ग्रेस ने प्रस्ताव पास कर सुनीता को शुभकामनाए दी। सुनीता के वापिस आने पर कान्ग्रेस ने उन्हे अभिनन्दन दिये ।कान्ग्रेसी नेताओं ने उन्हें थोक मे अभिनन्दन दिये । प्रदेशाध्यक्ष भरत सोलंकी से ले सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल सभी ने दिल खोल अभिनन्दन दिये ।

इधर विद्रोही आत्मा सूरत के भाजपा विधायक धीरुभाई गजेरा ने इस मुद्दे पर मोदीजी की शाब्दिक धुलाई कर डाली। गजेरा भैया गरजते हुए कान्ग्रेसी भाषा में बोले कि राज्य में कन्या शिक्षा का ढोल पीट्ने वाले और भ्रूण हत्या के विरुध्ध अभियान चलाने वाले मुख्य मन्त्री नरेन्द्र मोदी सुनीता के बारे में इस लिये मौन है क्योंकि वह उनके जानी दुश्मन स्व हरेन पंड्य़ा की ममेरी बहन है।

उल्लेखनीय है कि हरेन पंड्य़ा की हत्या गुजरात की राजनीति में एक ऎसी गुत्थी है जो आज भी भाजपा में राजनीतिक भूचाल खडा कर देती है। हरेन के पिता से ले कान्ग्रेस के नेता और बागी भाजपाई सभी मोदी धुलाई में हरेन हत्या की लाठी का दिल खोल उपयोग करते है।

साफ़ है कि इस चुनावी वर्ष मे कान्ग्रेसियों और बागियों के लिये सुनीता एक रोकेट लौन्चर बन मोदी विरोधी खेमे से निकलेगी ।

(मित्रों हम इस चिठ्ठे को साईबर स्पेस के गूगल चक्र मे बैठा घर आये ही थे कि आफ़िस से सह सम्पादक नेहा जी का फ़ोन आया कि टेलीफ़ोन के तारों से मोदीजी का सुनीता जी को हार्दिक अभीनन्दन का फ़ेक्स आफ़िस मे लेन्ड हो गया है । देखी मोदीजी की आपदा प्रबन्धन व्यवस्था । अब देखना है कि जोर कितना बाजुए कान्ग्रेस और बागियों मे है !!!!)

Thursday, June 21, 2007

मोदी जी की प्रतिभा पाटिल को गुगली

आजकल प्रतिभा पाटिल चर्चा मे है। अपने अखबार वाले पन्ने भर भर उनके पक्ष और विपक्ष मे लिखे जा रहे हैं । उनके बारे मे अच्छे अच्छे को मालूम नही था, आज उनकी चर्चा हर जबान पर है। ऎसा ही होता है । जब भाग्य जागता है तो दुनिया जानती है ।वो राष्ट्रपति बनने वाली है, भले भाषा शास्त्री इस पर विवाद करे कि महिला राष्ट्रपति कैसे बन सकती है !

अगर नही बन पाई तब भी इतिहास मे तो अमर हो ही गई । अब जब भी राष्ट्रपति का चुनाव होगा अपने पत्रकार मित्र अपने डेटा बेज मे से या फ़िर गूगल सर्च मे से प्रतिभा जी का कच्चा चिठ्ठा निकाल लिखेंगे कि किस प्रकार उनके चुनाव के समय एक तीसरा मोर्चा खुला था ? प्रतिभा जी को हराने के लिये भाजपा वाले अपने ही शेखावत जी को निर्दलीय बना रहे है। यू कहो कि निर्वस्त्र कर रहे हैं । तीसरा मोर्चा कलाम साहब के कन्धे पर बन्दूक रख प्रतिभा जी पर गोली दागने मे लगा हुआ है ।

यह सब भविष्य के पत्रकारों के लिये वो मसाला है जो गीगा बाइट मे अलग अलग सजाल मे इकठ्ठा हो रहा है ।आज अपने भाई लोग लक्ष्मी सहगल के बारे मे लिख रहे हैं, फ़िर लक्ष्मी सहगल और प्रतिभा जी के बारे मे लिखेंगे। कहने का अर्थ है कि उन्होने इतिहास बना लिया । खैर हम यहा हमारे नरेन्द्र मोदीजी के विचार दर्ज करने बैठे है। वो हमारे इसलिये हैं क्योकि हम उनके पांच करोड गुजरातवासियो मे से एक है। वैसे हम आपको बता दे कि पिछले पांच वर्ष से पांच करोड की रट लगाने वाले अपने मोदी जी ने अपने पिछ्ले भाषण मे यह संख्या बढा कर साढे पांच करोड कर दी थी।

मोदीजी की मुख्यमन्त्री बनने के बाद से यह शिकायत है कि मीडिया उनके अच्छे विचार नही लिखता है। उनके २०६३ दिन पूरे करने के उपलक्ष्य मे आयोजित कार्यक्रम मे तो उन्होने खुल कर कह दिया कि मैने इन्हे( मीडिया) पांच वर्ष झेला है, आप इन्हे थोडा समय झेलें । उन्होने यह भी कहा कि अगले छह महिने सत्य की आशा छोड दो इनसे।

अपने मोदी जी ने प्रतिभा जी के सामने तीन शर्ते रखी हैं । पहली तो यह कि वे विदेशी मूल के व्यक्ति के प्रधान मन्त्री न बनने दें, दूसरा यह कि वे अफ़ज़ल को फ़ांसी लगवाये और तीसरा यह कि वे महिला आरक्षण विरोधी लालू यादव का मत ठुकराये । देखी अपने मोदीजी कि प्रतिभाजी को गुगली । हम चाहते हैं कि भविष्य मे जब राष्ट्रपति पद के लिये कोई विवाद जागे तब मोदीजी के इस त्रिशूल विचार का ध्यान जरूर रखा जाये । व्यंग्य

Monday, June 11, 2007

श्री श्री रा धु प प्र २०६३ मोदी जीं

आप भी आश्चर्य मे होंगे कि मोदीजी के लिए यह कैसा संबोधन । चिन्ता मत करो मित्रों। हम किसी के बारे में खराब नही सोचते । यह बात अलग है कि लोग अपने हिसाब से मतलब निकाल तरह तरह का सोच लेते हैं। गुजराती मे एक संबोधन है। ध धु प पू अर्थात धर्म धुरंधर परम पूज्य । अपने मोदीजी तो मोदीजी हैं। वो धर्म का एक चेहरा हैं। वो तो उससे भी आगे हैं।

सुना है एम ए मे राजनीती शास्त्र उनका एक विषय था । गुजरात की राजनीती पर पुस्तक लिखने वाले डी ऍन पाठक उनके शिक्षक थे। पर उनकी राजनीती से साफ है कि वो किताबी ज्ञान से बहुत आगे है। अगर चाणक्य जिंदा होता तो वो भी मोदीजी से जरूर कुछ ना कुछ सीख ही लेता। अरे मोदीजी बिना किसी चाणक्य की मदद के पूरे २०६३ दिन से मुख्यमंत्री कार्यालय मे अड्डा जमाये हैं ।

भा ज पा अध्यक्ष राजनाथ सिंघ ने भी साफ कर दिया कि भले ही केशुभाई और उनके चेले मोदी हटाओ के उनके पांच साल से चल रहे कार्यक्रम में लगे रहें , पर अंगद के पाँव की तरह उन्हें कोई हिला नही सकता। वो चुनाव तक ही नही उसके बाद भी मुख्यमंत्री बने रहेंगे। केशुभाई भी सोचते होंगे कि अगर मोदी को दिल्ली वनवास नही दिलवाया होता तो ना तो उन्हें वनवास भुगतना पड़ता और ना ही मोदी जीं के दिल्ली के तार इतने मजबूत होते। खैर उनके भाग्य को यही मंजूर था। यह तो रही बात रा धु यानी कि राजनीती धुरंधर की।

हमारे मोदीजी परम पूज्य तो हैं वे परम प्रेरणा भी हैं। किसी भी मंत्री का भाषण सुनो। सभी के भाषण कुछ इस तरह शुरू होते हैं। आदरणीय गुजरात के लोकप्रिय मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रेरणा और मार्गदर्शन से यह काम हो रहा है। कई बार लगता है कि बेकार मे मंत्री रख रखे हैं। खैर ये तो मोदीजी की बात है , हम कौन होतें हैं इस मामले मे पड़ने वाले। पर इसमे कोई शक है क्या कि वो प प्रे , परम प्रेरणा हैं।

आप सभी ने १०१, १०८ , १००८ की महिमा तो सुनी होगी। मोदीजी ने २०६३ को सार्थक बना दिया है। तभी तो गुजरात भा ज पा ने उन्हें २०६३ कमल के फूलों की माला पहराई , लकड़ी के व्यापारियों ने २०६३ गुलाब की माला पहराई । शायद कुछ दिनों बाद लोग २०६३ मणकों की माला का जाप कर मोदीजी को सफलता और संकटमोचन के देवता के रुप मे पूजें ।

तो बोलो रा धु प प्रे २०६३ मोदीजी की जय ।
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