Saturday, July 28, 2007

दो बार इस्तीफ़ा देने के बाद भी बने हुए हैं मंत्री अपने भाई..

राजनीति में इस्तीफ़ा बडा ही सशक्त शस्त्र है। बस इस्तीफ़े के धमकी से ही काम चल जाता है। लोग देते नही है। मालूम नहीं कब स्वीकार हो जाए।

पर अपने भाई तो भाई हैं। उनके दोस्त और दुश्मन सभी उन्हे भाई कहते हैं वैसे उन्हे भी यह सम्बोधन काफ़ी प्रिय है। वैसे तो उनके दो दो चुनाव जीतने के बावजूद भी वो मुम्बई पुलिस की भाई की लिस्ट में ही हैं।

अपने भाई है गुजरात के पुरषोत्तम सोलंकी। मोदीजी के मंत्रीमंडल में मछली मंत्री! सरकारी गनमैन हो या न हो भाई के अपनी सिक्योरिटी तो हमेंशा साथ रहती है।

उन्होने उनकी जाति की दो युवतियों के बलात्कार के विरोध में दो बार इस्तीफ़ा दे दिया। कार और बंगले का भी उपयोग करना बंद कर दिया। गांधीनगर में सचिवालय की तरफ़ मुंह करना भी बंद कर दिया।

एका एक कल सभी समाचार पत्रों में उन्होने एक प्रेसनोट भेज डाली। पाकिस्तान की जेलो से भारतीय मछुआरों को छुडवाने के लिये । सभी पत्रकार आश्चर्यचकित! कई मित्रो ने फ़ोन कर डाले। पूछा भाई ये क्या?

अपने भाई भी कम थोडे है। बोले हमने इस्तीफ़ा दिया यह एक हकीकत । पर साथ ही यह भी एक हकीकत है कि मुख्यमंत्री नरेन्द्रभाई ने अभी तक स्वीकार नही किया है! और मजबूरन में मंत्री हूं !!

गुजरात के सांसद जेटली गुजरात आ रहे है!

अरुण जेटली गुजरात के सांसद हैं। उनका गुजरात आना एक समाचार बन जाता है। वो कब आते है, कब चले जाते है, क्या कर जाते है वह शायद केवल भाजपा कार्यालय के रिकार्ड की बाबत है, जिस तरह संसद में उनका गुजरात का प्रतिनिधि होना।

गुजरात भाजपा के मीडिया को आर्डिनेटर और जेटलीजी के अहमदाबाद के एक निकटतम सूत्र यमल व्यास बतलाते है कि जेटलीजी पिछ्ली बार अप्रैल में आए थे। प्रयोजन था चेम्बर में एक कार्यक्रम । वैसे भी राज्यसभा सांसदो को आम आदमी से नाता ही क्या?

पहले महिने दो महिने में चक्कर मार लेते थे, पर जबसे उन्होने माधुपुरा बैंक का कई हजार घोटाला संभाला है सब कुछ दिल्ली में ही निपटा लेते हैं। वो घोटालेबाजो की पैरवी कर रहे हैं। क्योंकि केस सुप्रीम कोर्ट में था इसलिये वे घोटालेबाजो को दिल्ली में ही मिल लेते है।

यह बैंक घोटाला इतना बडा था कि गुजरात की १०० से ज्यादह बैंक इसके कारण डूबने के कगार पर आ गई। नतीजा यह हुआ कि इससे लोगो ने जेटलीजी का अहमदाबाद आना ही बंद करवा दिया!

खैर अब जब वो आ रहे हैं तो मोदीजी अपनी जेड प्लस सिक्योरिटी दे कर भी उन्हे बचायेंगे। वैसे मोदी-जेटली रिश्ता काफ़ी प्रेम भरा है। पर अब तो अपने जेटलीजी मोदीजी के भाजपा इलेक्शन एजेंट बन कर आ रहे हैं।

राजनाथसिंहजी ने आगामी विधानसभा चुनाव की बागडोर तो मोदी जी के हाथ में सौंपते हुए कहा कि आपके प्रिय अरुण जेटली इस कार्य में आपके सहयोगी होंगे।

Friday, July 27, 2007

गुजरात में जनसंघ ने छेडी भाजपा के विरुद्ध जंग

गुजरात में चुनावी दौड में जनसंघ ने भी उसके घोडे उतारने की तैयारीयां शुरु कर दी है। उसके प्रदेश अध्यक्ष गोपाल भाई पटेल ने हाल ही में एक फ़ोर कलर पुस्तिका भी प्रकाशित भी की है। इसमे जनसंघ और हिन्दुत्व के बारे में कई लेख भी है।

सबसे अधिक ध्यान खेंचने वाला एक रंगीन चार्ट है जो यह बताता है कि भाजप उसकी मूल संस्था जनसंघ से कितना अलग और गिरा हुआ है। स्थापक के बारे में लिखा गया है कि जनसंघ की स्थापना भारत केसरी डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और राजश्री बलराज मधोक जैसे महानुभावो ने की तो भाजप की स्थापना अटल आडवानी की जुगल जोडी ने की।

दल के ध्वज के बारे में इनका कहना है कि जनसंघ का ध्वज शत प्रतिशत शुद्ध भगवा है जबकि भाजपा के झंडे में ३३ प्रतिशत हरा रंग मुस्लिम तुष्टिकरण का संकेत है। जनसंघ के प्रेरणा स्त्रोत है डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पं. दीनदयाल उपाध्याय जैसे हिन्दुवादी नेता जबकि भाजपा के प्रेरणा स्त्रोत है गांधी, नेहरु, जयप्रकाश नारायण और सिकंदर बख्त जैसे नेता।

लक्ष्य के बारे में उनका कहना है कि जनसंघ का लक्ष्य हिन्दु राष्ट्र बनाना है और भाजपा का लक्ष्य मुस्लिम तुष्टिकरण कर किसी भी किंमत पर सत्ता हांसिल करना। जनसंघ के पास बलराज मधोक और प्रफ़ुल गोरडिया जैसे प्रतिभा संपन्न स्वच्छ, निडर और बहादुर नेता है तो भाजपा बाजपाइ, आडवानी जैसे सत्ता लोलुप, स्वार्थी, भ्रष्टाचारी और बिनकार्यक्षम शासन प्रणाली नेताओ का शंभु मेला है।

भैया चुनाव है, इस वर्ष चुनाव है ।

Thursday, July 26, 2007

फ़ेल नही हो पाने से नाराज छात्र

गुजरात की सौराष्ट्र युनिवर्सिटी का एक छात्र बडा दुखी है। उसकी तमाम कोशिशो के बावजूद वह फ़ेल होने मे सफ़ल नही हो सका। इस छात्र अमित पंड्या ने युनिवर्सिटी से पूछा है कि उसके गलत और वाहियात जवाबों के बावजूद उसे पास क्यों किया गया है।

उसका कहना है की उसने केवल ४० नंबर के प्रश्नो के ही जवाब लिखे थे। वे भी गलत सलत। इसके बावजूद उसे पास कर दिया गया है। क्यों ? क्या मै युनिवर्सिटी का दत्तक पुत्र हू? उसने युनिवर्सिटी को प्रश्न किया है। आमित की नारजगी का कारण जोरदार है।

MA -I हिन्दी की परीक्षा मे उसके तीन पेपर खराब गये थे। परिणाम अच्छा लाने के लिये उसने सोचा कि वो फ़ेल हो जाये और अगले साल बेहतर तैय्यारी के साथ परीक्षा मे बैठे। इसलिये उसने गलत सलत जवाब लिखे। और केवल ४० नंबर के प्रश्नों का ही जवाब लिखा।

उसका कहना है कि पहले तीन प्रश्नों का जवाब ही नही लिखा। चौथे प्रश्न के जवाब मे उसने अपनी ही व्याख्यायें ही लिखी और लेखकों के नाम पर अपने दोस्तों के नाम लिख दिये। प्रश्न था काव्यानुवाद की समस्या के बारे मे।अमित ने अपने मित्रों के नाम और उनके घर के पते लिख डाले। प्रश्न पांच के सवाल के जवाब मे अमित ने रजनीश और गौतम बुध्ध के बारे मे लिखा और जब इससे भी संतोष नही हुआ तो क्यों की सांस भी कभी बहु थी सीरियल के बारे मे लिख डाला।

उसने युनिवर्सिटी से पूछा है कि सभी सवालों के जवाब लिखने वाले फ़ेल हुए है तो मै कैसे पास हो गया? युनिवर्सिटी के अधीकारियों के होश उड गये है अमित के खुले प्रश्नों से ।

Wednesday, July 25, 2007

दो पूर्व मुख्यमंत्रियों के जन्मदिन

चुनाव के दिनों मे नेताऒ के जन्मदिन की बात ही अलग है पिछ्ले चार दिनों में गुजरात के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों ने उनके जन्मदिन मनाए। ये है शंकरसिंह वाघेला और केशुभाई पटेल । दोनों में काफी समानताए है ।

दोनों मूलत: संघ परिवार से है । गुजरात के अन्य मुख्यमंत्रियो को कौन पूछता है। माधवसिंह सोलंकी, दिलीप परिख, छबील्दास मेहता, सुरेश महेता, सब ना जाने कहां खो गये हैं ।

दोनों ही राजनीति में सक्रिय है । वाघेला मनमोहन सिंघ सरकार में कपडा मंत्री है। केशुभाई राज्यसभा के सदस्य है और गुजरात की राजनीति में काफी सक्रिय है। मजेदार बात तो यह है कि इन दोनों का दुश्मन एक ही है, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ।

शंकरसिंह वाघेला के गांधीनगर स्थित आलीशान बंगले “वसंत वागड“ में तो बसंत का ही माहौल था। साढे नौ से डेढ बजे तक में हजारों की भीड़ । बगंले से एक किलोमीटर दूर लम्बी पार्किंग की भीड़ । हमेशा ही शंकरसिंह बापू के दर्शन के लिए १००-१५० की लाईन ।

हमें तो बापू के जन्मदिन पर एक चीज बडी ही जोरदार लगी । खाने के दस काउन्टर । हलवा, आम के मठा के साथ तरह तरह के व्यंजन । लोग आते रहे ,बापू के दर्शन के बाद भोजन कर देर तक बतियाते रहे।

हर साल वसंत वगडा में २१ जुलाई को बहार आती है। इस बार तो इस बहार की बात ही कुछ और थी। बापू के एक विशवस्त ने इसका राज खोला । इस वर्ष चुनाव हैं। सही बात है टिकट चाहिए तो अपना प्रभाव यहां बताओ।

केशुभाई भी वाघेलाजी की तरह जमीनी नेता हैं। इस बार उनके यहां नेताओं को तो छोडों कार्यकर्ता भी नहीं दिखाई दिये। हाँ अपने मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदीजी जरुर आये। आने से पहले ही उन्होने फोटोग्राफरों और चैनलवालों को केशुभाई से जन्मदिन हैडंशेक के एतिहासिक फोटो के लिये न्योता दे दिया था।

सब आए। पर केशुभाई ने मोदीजी के साथ फोटो खिचवाने से इंकार कर दिया। साफ है एक दिन पहले ही मोदीजी ने उनके पांच प्यारों को शहीद कर दिया था। अपने पांच प्यारों के खून से रक्तरंजित मोदी से तो वो बात भी नहीं करना चाहते । वो तो अतिथि देवो भव: के भाव से उन्होने मोदीजी को उनके बंगले में आने दिया।

आज सभी कह रहे हैं कि कौन जायेगा केशुभाई के बंगले । चुनाव का वर्ष है, टिकट चाहिए। केशुभाई की छाया पडना मतलब है टिकट कट जाना !!

Tuesday, July 24, 2007

एक सम्‍पादक जो सभी रचनाओं का उपयोग करता था

प्रत्‍येक लेखक की इच्‍छा होती है कि उसकी सभी रचनाएं छपें। पर पत्रकारिता में यह सम्‍भव नहीं। इसीलिये तो हर पत्रकारिता के छात्र को पहले दिन ही कहा जाता है कि कभी भी रचना के वापिस लौटने से नाराज न हों।


खैर, हम यहां एक ऐसे सम्‍पादक के बारे में लिख रहे हैं जिसके बारे में यह मशहूर है कि वह कभी भी किसी रचना को वापिस नहीं लौटाता था। वह उसके कार्यालय में आई प्रत्‍येक रचना का उपयोग करता था।


यह था "वीसमी सदी" मासिक का सम्‍पादक हाजी मोहम्‍मद अल्‍लारखा शिवजी। १९१६ में शुरु हुआ यह प्रकाशन पांच वर्ष तक निकला। इसका हर अंक लाजवाब था। जैसा कि हम अपनी पिछली पोस्‍ट में लिख चुके हैं कि इसके रद्दी के अंकों ने कुछ मित्रों को इतना प्रेरित किया कि इस रविवार को उन्‍होंने इसका डिजीटल अवतार लांच किया।

मासिक में प्रत्‍येक रचना उसके हाथों से लिखी होती थी। आज के जमाने मे टाइम और न्यूजवीक कोपी राइटर रखते है , हाजी उस जमाने मे यह विचार लाया था उस जमाने में भी वह लेखकों को अच्‍छे पैसे देने में मानता था। दीपोत्‍सव अंक में उन्‍होंने गोवालणी नामक लघु कथा छापी। वह गुजराती की पहली लघु कथा थी। लोगों ने उसकी बहुत तारीफ़ की। हाजी ने अपने कुछ मित्रों को कहा को यदि मेरे पास पैसे होते तो मैं इसके लेखक रा।मलयानिल को सौ रुपये देता।

किसी सम्‍पादक को यह लगे कि उसने लेखक को कम पैसे दिये हैं यह एक बहुत ही बिरली घटना है। एक बार उन्‍होंने अपने एक लेखक मित्र के समक्ष इसका राज खोला। वो बोले मैं पैसे उडाता नहीं हूं। मैं मेरे प्रकाशन को लाभ के लिये भी नहीं करता हूं।


पर, उन्‍होंने कहा, मेरी इच्‍छा है कि मेरे गुजरात में कोई बर्नाड शो बने, कोई जी चेस्‍टटर्न बने, कोई एच जी वेल्‍स बने। ये नामक प्रखर विचारकों के हैं। आम आदमी उन्‍हें नहीं पढता। पर वीसमी सदी में हाजी का उद्देश्‍य था लोगों को मनोरंजक शैली में चित्रात्‍मक स्‍वरुप में ओतप्रोत जानकारी देना।
एक बार हाजी अपने मित्रों को नाचने गाने वाली महिलाओं के क्षेत्र में ले गये। एक लटके झटके वाली महिला आई। इनके मित्र काफ़ी अचम्‍भित। हाजी यहां क्‍यों लाएं। हाजी ने अपने इस मित्र, एक बहुत बडे चित्रकार, रविशंकर रावल को कहा कि घबराओ मत। मैं तुम्‍हें यह बताने लाया हूं कि, यहां की महिलाएं भी वीसमी सदी पढती हैं।


उस महिला ने तुरंत कहा कि हाजी इस बार का अंक नहीं मिला। हाजी ने कहा कि वो इस बार का अंक खुद लाये है। क्‍योंकि उनकी प्रति डाक में वापिस आई है !! ऐसे थे हाजी।


उनके ४,००० से अधिक सशुल्‍क ग्राहक थे। ए एच व्‍हीलर जो भारतीय भाषाओं के प्रकाशनों को महत्‍व नहीं देता था वह भी वीसमी सदी रखता था। रु १५-१६ मासिक तन्‍ख्‍वाह वाले उनके चाहक मिल कर अठन्‍नी खर्च कर वीसमी सदी खरीदा करते थे।


यह सब हमने वीसमी सदी के डिजीटल स्‍वरुप के कार्यक्रम में दी गई जानकारी के आधार पर लिखा है। आप भी http://www.gujarativisamisadi.com/ क्लिक कर इस पत्रिका की भव्‍यता का नजारा देखिये।

Monday, July 23, 2007

गुजरात भाजपा की महाभारत के पात्र

गुजरात भाजपा मे चल रहे महाभारत को कौन नही जानता। कल ही आला कमान ने पांच बागियो को निलम्बित कर दिया। इन पांच पांडवों से पहले दो तो निलम्बित की सूची मे है ही। आप कह सकते हैं- सप्तरंगी विरोध बागियों का । यदि आप लिंग भेद ढूंढना चाहते हैं तो आप सफ़ल नही होंगे। इसमे दुर्गा स्वरूप रमीलाबेन देसाई भी है।

अब जब महाभारत चल रही है तो पात्र तो होंगे ही। बागी गोरधन झडफ़िया ने इन पात्रों की जो सूची जारी की है वह आज के गुजरात के अखबारों मे काफ़ी चमक रही है।

इस महाभारत के धृतराष्ट्र हैं, पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी , दुर्योधन हैं, मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ,भीष्म है पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल ।पूर्व केंद्रिय कपडा मंत्री काशीरम राणा को दिया गया है द्रोणाचार्य का नाम और पूर्व मुख्य मंत्री सुरेश महेता बने है कृपाचार्य ।
प्रदेश अध्यक्ष पुरुशोत्तम रूपाला हैं इस महाभारत के कर्ण और प्रभारी ओम माथुर बने शकुनी मामा ।पूर्व मंत्री गोरधन झडफ़िया है युधिष्टर और पूर्व मंत्री बेचर भादाणी का पात्र है भीम का , बावकु उघाड को दिया गया है नाम सहदेव, विधायक बालु तंती की भूमिका है नकुल की , विधायक सिद्धार्थ परमार को नाम दिया गया है अभिमन्यु। कार्यकर्ता बने है द्रौपदी और गुजरात की जनता कृष्ण।
रमीलाबेन को कोई पात्र नही दिया गया है शायद इस्लिये कि वे स्वयं को रणचंडी घोषित कर चुकी है।

कुछ सुर्खिया भी जोरदार हैं:

भाजपा मे महाभारत, पांच पांड्वों को बाहर निकाल दिया

अरुण जेटली ने पहले माधुपुरा बैंक डुबोई अब भाजपा डुबोयेगा

जरासंध मोदी के अत्याचार बहुत हुए अब उसका वध जरूरी, सांसद कथीरिया

पार्टी शुद्ध हुई अब चुनाव की तैय्यारी करो, रूपाला

एक कुलपति जो स्‍कूल में भी नहीं पढा

यह कोई स्‍कैंडल नहीं है। यह है कहानी गुजरात विद्यापीठ के नये कुलपति नारायण देसाई की। महात्‍मा गांधी के सेक्रेटरी महादेव देसाई के पुत्र नारायण देसाई ने गुजरात विद्यापीठ के कुलपति का कार्यभार संभाल लिया है।

८३ वर्षीय नारायण देसाई आज अहमदाबाद में गुजरात विद्यापीठ में आये। नारायण देसाई आजकल उनकी गांधी कथा के लिये मशहूर हो रहे हैं। उनका कहना है कि गांधी संदेश फ़ैलाने का यह अभियान ही उनका मुख्‍य कार्य है।

गुजरात विद्यापीठ का उनका कार्य उसी सीमा तक होगा जहां तक वह उनके इस मिशन में बाधा नहीं बनता। वे विद्यापीठ के कामकाज में दखलंदाजी नहीं करेंगे। साथ ही उन्‍होंने यह भी स्‍पष्‍ट किया कि उनकी भूमिका वर्ष में सात दिन की हाजरी के नियम तक सीमित नहीं रहेगी।
नारायण देसाई गांधीवादी है यह तो सभी को मालूम है। पर, उनकी सबसे बडी खासियत यह है कि उन्होंने औपचारिक शिक्षा नहीं पाई है। स्‍कूल में एकाध वर्ष ही उनकी औपचारिक शिक्षा है।महात्‍मा गांधी, विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण के खुले विद्यापीठ में उन्‍होंने निरंतर शिक्षा प्राप्‍त की है। वे अनेक भाषाओं के ज्ञाता हैं। अभी तक उन्‍होंने लगभग ५० पुस्‍तकें लिखी हैं। उनकी मशहूर पुस्‍तकों में "संत सेवता सुकृत वाद्ये" "रवि छबि" "टु वार्डस ए नान-वायलेंट रिवोल्‍यूशन" "मने केम बिसरे रे" "अग्‍नि कुंड में उगा गुलाब" और मारु जीवन एज मारी वाणी भाग-१ से ४ शामिल है।

नारायण देसाई ने जीवन के अधिकांश वर्ष खादी, नई तालीम, भूदान, ग्रामदान, शांति सेना एवं अहिंसक आंदोलन में बिताए हैं। उन्‍होंने सर्वोदय कार्यकर्ता, पत्रकार, एवं शिक्षाविद के रुप में भी यशस्‍वी कार्य किए हैं। "भूमिपुत्र" के स्‍थापक संपादक एवं "सर्वोदय जगत" (हिन्‍दी) एवं विजिल (अंग्रेजी के संपादन-प्रकाशन) में सहयोग दिया है। आपातकाल के दौरान वे भूमिगत रहकर कार्यरत थे। नारायण देसाई ने संपूर्ण क्रांति विद्यालय, वेलघी द्वारा सच्‍चे अर्थ में शिक्षा, प्रशिक्षण एवं वैकल्‍पिक जीवन शैली के निर्माण का कार्य किया है।

उप-कुलपति सुदर्शन अयंगर का कहना है कि देसाई वैकल्पिक शिक्षा के जीवन्त उदाहरण हैं ।

फ़र्जी मुठभेड में गिरफ़्तार वणझारा जब जेल से बाहर निकले

फ़र्जी मुठभेड मे गिरफ़्तार डग डी जी वणजारा और अन्य को आज अदालत मे पेश किया गया। वणजारा का अंदाज एक हीरो सा था और उससे मिलने भी काफ़ी लोग आये थे। पेश है कुछ तसवीरें ।





सरदार पटेल ने जब विक्‍टोरिया गार्डन में तिलक का बुत रख दिया

आज बाल गंगाघर तिलक का १५१वां जन्‍मदिन है। अहमदाबाद से उनका काफ़ी महत्‍वपूर्ण सम्‍बन्‍ध रहा है। आज से ९९ वर्ष पूर्व उन्‍हे काफ़ी रहस्‍यमय तरीके से साबरमती जेल में लाया गया था।
हालांकि वे इस जेल में ५३ दिन रखे गये, यहीं उन्‍होंने स्‍वराज हमारा जन्‍मसिद्ध अधिकार है, हम स्‍वराज लेकर रहेंगे का नारा दिया था।
इस स्‍वतंत्रता सेनानी को उनकी पुस्‍तक गीता रहस्‍य के लिये भी जाना जाता है। उनकी मृत्‍यु १ अगस्‍त १९२० में हुई। १९२४ में अहमदाबाद के विक्‍टोरिया गार्डन में उनका बुत रखा गया। विक्‍टोरिया के स्‍तूप के समान्‍तर।
उस समय सरदार वल्‍लभभाई पटेल अहमदाबाद म्‍युनिसिपेलिटी के अध्‍यक्ष थे। यह बुत उन्‍होंने लगवाया था। इस अवसर पर गांधीजी ने कहा था कि सरदार पटेल के आने के साथ ही अहमदाबाद म्‍युनिसिपेलिटी में एक नयी ताकत आयी है। मैं सरदार पटेल को तिलक का बुत स्‍थापित करने की हिम्‍मत बताने के लिये उन्‍हें अभिनन्‍दन देता हूं।

रद्दी के ढेर से उभरा बीसवीं सदी का डिजीटल अवतार

कुछ वर्ष पूर्व मुम्बई मे एक उध्योगपति को सन्डे बाज़ार मे एक बहुत ही आकर्षक मासिक की कुछ प्रतियां मिली। उध्योगपति नवनीत शाह को आज भी याद नहीं कि ये प्रतिया उनके हाथ कब लगी। इसी प्रकार कुछ समय पहले अहमदाबाद के एक पत्रकार धीमंत पुरोहित को एक सचित्र प्रकाशन की कुछ प्रतिया हाथ लगी। इन दोनो सहित्य के रसियाओं ने अपने अपने प्रकाशन के और अंकों की खोज शुरू कर दी।

और आज से लगभग दो वर्ष पूर्व गुजरात के एक मशहूर कोलमनिस्ट रजनी पंडया को इन दोनो ने अपनी इन अंकों की खोज के बारे मे कहा। उसे मालूम पडा कि ये दोनो एक ही मासिक के अंको के ढूंढ रहे थे। यह था गुजराती भाषा मे तब बम्बई से प्रकाशित होने वाला मासिक वीसमी सदी अर्थात बीसवीं सदी। १९१६ मे शुरू हुआ यह मासिक केवल पांच वर्ष ही निकला यानि की केवल ६० अंक।पर इसके सम्पादक की सोच, प्रकाशन की गुण्वत्ता के कारण १९१६ का यह मासिक ९० वर्ष बाद भी पत्रकारिता का एक स्तम्भ है।

उस जमाने मे इसके मालिक एंव सम्पादक हाजीमोहम्मद अल्लारखा शिवजी ने बीसवी सदी को फ़ोर कलर मे निकाला था। उनका नाम वे अपने दादा के नाम के साथ लिखते थे, और यह इस बात का परिचय देता था कि उनके दादा हिन्दु थे। इसका टाईटल पेज इंगलैंड मे बनता था और इसके १०० पन्नों मे १२५ चित्र होते थे और वह भी गुण्वत्ता वाले।

हाजीमोहम्मद खुद को बीसवीं सदी का अधीपती कहते थे। उनके विचार स्पष्ट थे। पाठक को रोचक शैली मे सचित्र पठनीय सामग्री देना।

खैर, अब इन तीनों, नवनीत भाई, धीमंत और रजनी पंडया ने बाकी के अंकों की खोज जारी रखी। अथक प्रयत्नों के बाद वे केवल ५५ अंक ही इकठ्ठे कर पाये। नवनीत भाई के आर्थिक सहयोग और बिरेन पाध्या के तकनीकी संसाधनों की मदद से इन ५५ अंको को डिजीटाईज किया गया । और इस डिजीटल अवतार का अनावरण कल शाम को अहमदाबाद में एक भव्य कार्यक्रम मे हुआ। इस वेबसाईट को लोंच किया ९७ वर्षीय रतन मार्शल ने । अपनी पूरी सलामत बत्तीसी वाले मार्शल की आवाज मे किसी फ़ौजी की बुलन्दी खनकती है। मार्शल की खासियत यह है कि गुजराती पत्रकारिता का ईतिहास लिखने वाले मार्शल की ५७ वर्ष पूर्व लिखी गई पुस्तक का कोई सानी नही है।

इस वीसवीं सदी को डिजीटल अवतार दिलाने वाले मित्रों को एक बात का बहुत दुख है। उनके तमाम प्रयत्नों के बावजूद वे हाजी के वंशजो को ढूंढ नही पाये हैं। उनके इन प्रयत्नों के बारे मे भी हम लिखेंगे। यदी आप किसी को यह जान्कारी मिले तो आप हमे या इस प्रकाशन की वेबसाईट पर दे सकते है। यह वेबसाईट वीसवीं सदी के सौंदर्य और भव्यता की झलक देती है। पीले पडे कागजों मे बिखरी हाज़ी की पत्रकारिता कहती है- खंडहर बता रहें हैं कि इमारत कभी बुलंद थी। इस वेब साईट का URL है, http://www.gujarativisamisadi.com/ भले ही आपको गुजराती नही आती हो, हाजी का सौंदर्य बोध तो आपअको उसी तरह लुभायेगा जिस तरह उसका जादू नवनीत भाई और धीमंत के सिर चढ कर बोल रहा है ।

Saturday, July 21, 2007

अहमदाबाद में अब एक और एफ़ एम रेडियो

अहमदाबाद वासियों को अब एक और एफ़ एम रेडियो मिल गया है। यह है ९४.३ माई एफ़ एम दिल से। अभी कुछ समय पहले ही (दोपहर तीन बजे) इस एफ़ एम रेडियो का प्रसारण शुरु हुआ।

टाइम्स के रेडियो मिर्ची की टक्कर में भास्कर ग्रुप का माई एफ़ एम दिल से। रेडियो मिर्ची २४ घंटे है जबकि माई एफ़ एम सुबह सात से रात के बारह तक होगा।

घोषणा के अनुसार यह कार्यक्रम ७० किमी की त्रिज्या में सुना जा सकता है। इस ग्रुप के अन्य भारतीय शहरों में एफ़ एम है इसलिए श्रोताओं को वैरायटी मिलने की पूरी संभावना है।

कुछ भी हो अब अपने अमदावादियों को बोरियत का तीसरा विकल्प मिल गया है।

Friday, July 20, 2007

जब विधानसभा मे मोदी जिन्ना भाई भाई गूंजा

गुजरात विधान सभा का दो दिन का मानसून सत्र बडे ही चटपटे अंदाज मे खत्म हुआ। पूरे दिन ही कांग्रेसियों की नारेबाजी गूंजती रही। वाक आउट का नया अंदाज देखने को मिला। अपने कांग्रेसी भाई मोदी सरकार की हाय हाय बोलते सदन के बाहर जाते और अगले पल वापिस आ जाते। ये था अपने कांग्रेसियों का सांकेतिक वोक आउट।
इस सब आवन जावन मे अध्यक्ष ने दो सद्स्यों को बाहर भी निकाल दिया। पर अपने भाजप के बागी धीरु गजेरा का तो अंदाज ही अलग। खडे हो गये सरकारी मैगेजीन गुजरात को हाथ मे ले और बोले इसमे ये जिन्ना के लेख का क्या? बस कांग्रेसी तो थे ही टूट पडने को तैय्यार ।शुरू हो गये नारे मोदी-जिन्ना भाई भाई और सांकेतिक वोक आउट ।
पर इस दौरान अपने धीरुभाइ को बाहर नही निकाला गया। अध्यक्ष ने सिपाही भेज उन्हे उनकी कुर्सी पर बिठवा दिया। और बाहर अपने कांग्रेसी लगे चिल्लाने आडवाणी-जिन्ना भाई भाई,जशवंत मसूद भाई भाई ...
और थोडी देर मे गजेरा चुपचाप खिसक लिये। भैय्ये इसे राजनीति कहते हैं।

Wednesday, July 18, 2007

गोल्फ़ क्लब से अपना स्टेटस बनाओ

आज गांधीनगर मे अपने शिब्बू भाई मिल गये। आजकल वो गांधीनगर के एकमात्र रेसोर्ट और स्पा, केम्बे रेसोर्ट एंड स्पा मे है। हमने पूछ ही लिया शिब्बू भाई क्या चल रहा है? आजकल कहां घूम रहे हो। अपनी मलयाली अंग्रेजी मे बोले कि अब वो मैनेजर गोल्फ़ हैं केम्बे रेसोर्ट और स्पा मे । काम क्या करते हो ?, हमने पूछा । तपाक से बोले मार्केटिंग करता हू, गोल्फ़ क्ल्ब की।

बोले आओ कभी, गोल्फ़ बडा अच्छा खेल है । ट्राई करो, हमारे गेस्ट बन कर आऒ। हमने कहा, पर यार हमे तो गोल्फ़ बडा उबाउ खेल लगता है। पतली डंडी से छोटी सी बोल को मारो और फ़िर चलो। अपनी क्रिकेट अच्छी। एक बार जम गये तो जब तक आउट ना हो तब तक बोल को झूडते रहो। खुद मझा लो और देख्नने वाले को भी मझा कराओ।

बोले कैसे पत्रकार हो। गोल्फ़ बडा ही अच्छा खेल है। प्रदूषण मुक्त वातावरण मे खेलते है आप। वैसे भले ही आपको चलना अच्छा नहि लगता है, पर हरे भरे वातवरण मे बोल के पीछे तो आप उत्साह से जायेंगे। हो गई ना आपकी वाकिंग ।सबसे अच्छा तो यह है कि आपका कम्पीटीशन आपसे खुद से ही है । अपना गोल ऊंचा रखिये और अपना ध्यान केंद्रित कर खेलिये आपकी एकाग्रता बढेगी। क्रिकेट खेल्ने के लिये तो कई खिलाडी चाहियें यहा तो बस आप ही आप है।

हमने कहा कि यार टाईम किसके पास है लम्बे मैदान मे इधर उधर होने का। क्या बात करते हैं आप, शिब्बू भाई बोले। हाई सोसाईटी मे काफ़ी लोकप्रिय हो रहा है गोल्फ़। पिछले छह महिनो मे ही १५० मेम्बर बन गये है। इतने बडे शहर अहमदाबाद और गांधीनगर मे से १५० मेम्बर भी कोई संख्या है क्या? हमने कहा। उनका कहना था कि यह काफ़ी बडी संख्या है । इसकी फ़ीस ही रू १.५० लाख है, २५ साल की । साथ ही केम्बे रेसोर्ट और स्पा मे कई सेवाएं । १०० से ऊपर कमरे है रिसोर्ट मे वो बोले ।

बोले मेम्बर बनने से ही आपका स्टेटस बढ जायेगा। देश विदेश मे लोग इसका उपयोग नेट्वर्किंग के लिये करते है। मतलब- सही मेलजोल बढाने के लिये। मालूम नही मेम्बर के स्टेटस कैसे बढते है, केम्बे रेसोर्ट और स्पा ने इस गोल्फ़ क्लब से गुजरात मे उसका स्टेटस जरूर बना लिया है । अपने शिब्बू भाई को ही लो। कहां तो सरकारी दफ़्तर मे स्टेनोग्राफ़रगिरी करते थे, और कहा अब गोल्फ़ मैनेजरी। बोले कि पहले तीन महिने तो लोगो से मिल्ने और उन्हे समझाने मे ही गये । बाद मे ही ये १५० मेम्बर बने। लगता है की गोल्फ़ समझाते समझाते उनकी गोल्फ़ खिलाडी सी लक्ष्य दक्षता बन गई है !!!

पत्रकार होने के नाते अपने पास तो कभी कभार शिब्बू भाई के गेस्ट बन अपना स्टेटस बढाने का मौका तो है ही । ही ही....

Tuesday, July 17, 2007

गुजरात मे गाईड पहले, किताब बाद मे

अपना गुजारात काफ़ी प्रगतिशील राज्य है। खैर यह किसी को बताने की जरूरत नही है । हर क्षेत्र मे प्रगतिशील। आज कई क्षेत्रो मे अन्य राज्य गुजरात के नक्शे कदम पर चलते है। जगह जगह लोग पाठ्य पुस्तक रामायण से उपर नही आते, अपने यहा तो पुस्तक आये या नही आये गाईड तो पुस्तक छपने से पहले ही आ जाती है।। अरे भैये हिन्दी मे जिसे सुनहरी कुंजी कहते हैं।

दस की किताब तो पचास की कुंजी। और लोग खरीदते है।अरे भैये दुनिया का खेल तो कुंजी का खेल ही तो है । अब सीधी बात है। जब जवाब है तो सवाल तो होगा ही। सभी को मालूम है कि परिक्षा मे नंबर तो जवाब के मिलते है। आप अगर प्रश्न लिखे बिना उत्तर पुस्तिका मे लिखे, जवाब ५, जवाब ३... कोइ कम नंबर देगा क्या?

अब एसे मे यदि नये पाठ्यक्रम की पुस्तके स्कूल खुल्ने के बाद भी बजार मे ना आये तो क्या समस्या ? गाईड जिंदाबाद । मास्तर जी जो पढायेंगे वो आप घर से ही सवाल जवाब के रूप मे गाईड मे पढ कर जाईये और खुश रहिये। आप हीरो तो बन नही सकते क्योकि आपके सभी साथी यही फ़ार्मुला अपना क्लास मे मेघावी छात्र बने हुए है!!

इस साल कक्षा ५ और ६ की नई पुस्तके छ्पी है। एक महिना हो गया, अभी थोडी थोडी बजार मे आ रही है। मा बाप ने बच्चो को गाईडे दिलवा दी हैं। रोज पूछ्ताछ करते हैं कि किताबे आयी है क्या ? जवाब मिलता है, जल्द ही आ जायेंगी। अब जब पुस्तके आयी हैं तब उनके भाव आसमान पर हैं । ५वी की अंग्रेजी की किताब का दाम रु ७।५० से बढ कर रु २८ हो गया है। ६ठी की अंग्रेजी की किताब का दाम रु ९ से बढ कर रु १५ हो गया है। इस तरह सभी के दाम बढा दिये है। आज कांग्रेस ने इस मुद्दे पर आंदोलन की धमकी दे डाली । शक्तिसिंह, कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता बोले कि गरीबों का क्या मोदीजी के राज मे?

ये कांग्रेसी गरीबों को गरीब ही बने रहना देने चाहते है। अपने मोदीजी ने देर से पुस्तके छपवा सभी को गाईड का उपयोग करते कर दिया। अब ये बच्चे महंगी किताबे खरीदेंगे। देखा गरीबों की भी खरीद शक्ति बढवा दी अपने मोदीजी और शिक्षा मंत्री आनन्दीबेन ने। कांग्रेसी मोदी राज मे कुछ अच्छा देख ही नही सकते।

Monday, July 16, 2007

एक गुजराती वेबसाइट की क्लिक अपील


क्या आपने कभी किसी को विज्ञापन पढने की अपील करते हुए सुना है? इस गूगल जमाने में क्या नही हो सकता। एक गुजराती अखबार अकिला की वेबसाइट पर आज एक अनोखी अपील देखने को मिली। वेबसाइट पर अखबार के निमिष गणात्रा ने लोगो को कहा है कि पिछ्ले १० वर्षो से यह अखबार लोगो को वेबसाइट के माध्यम से मुफ़्त समाचार उपलब्ध करा रहा है।

गणात्रा का कहना है कि वेबसाइट चलाने का खर्च बढता जा रहा है। वेबसाइट देखने वालो को विज्ञापन को क्लिक कर उन्हे यह खर्चा उठाने में सहयोग देना चाहिये। अकिला दुपहर का अखबार है और राजकोट में काफ़ी लोकप्रिय है। सौराष्ट्र क्षेत्र जहा लोग दुपहर को आराम करने की संस्कृति वाले है वहा इस अखबार का नारा है, "सुबह चाय, दुपहर को अकिला"। उल्लेखनीय है कि इस अखबार ने कुछ समय पहले ही गूगल एड्सेंस के विज्ञापन छापने शुरु किये है। साफ़ है कि यह अपील गूगल एड के लिये ही है।

आपने कोइ एसा प्रकाशन देखा है जो आप को विज्ञापन पढने के लिये प्रेरित करे? यह है उसकी अपील की तस्वीरें,



अहमदाबाद की रथयात्रा के साथ साथ

चलो अहमदाबाद की रथयात्रा शांतिपूर्ण पूरी हो गई। पुलिस से ले पत्रकार तक सभी ने रथयात्रा के शाहपुर से गुजरने के बाद चैन की सांस ली। पिछले कुछ वर्षो से यह यात्रा उजाले में ही संवेदनशील क्षेत्रो में से गुजर जाती है। अकेले शाहपुर क्षेत्र में ही एमर्जेसी बिजली व्यवस्था के लिये बडे पैमाने पर इंतजाम किये जाते है।

इस बार और वर्षो की अपेक्षा भीड कम थी। रथयात्रा के समय सामान्यत: बरसात होती है जिसे अमी छांटणा यानि की अमृत बरसना कहते है। पर इस बार अमृत नही बरसा। रथयात्रा के कुछ दिन पहले से गिरफ़्तारियां शुरु हो जाती है। इस बार तो जगन्नाथ मंदिर में से ४० जेबकतरें पकडे गये। इसमे से १० तो महिलाए थी!

यात्रा की एक झलकी,